Tuesday, December 11, 2018
संपादकीय

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-डा0 दिलीप अग्निहोत्री
दि दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में नाम दर्ज कराना उपलब्धि है तो अरविन्द केजरीवाल को सफल माना जा सकता है लेकिन चंद दिनों की इस सफलता ने असफलता की बड़ी इबारत लिखी थी। ‘आप’ की बन्द मुट्ठी लाख की लग रही थी, खुली तो खाक की रह गयी। कांग्रेस के सहयोग से मुख्यमंत्री बनने पर उन्हें शर्मिन्दगी नहीं थी। कसम तोड़ने का पछतावा नहीं था। अब जनलोकपाल पर सरकार गिराने पर गर्व का प्रदर्शन कर रहे हैं अब भाजपा और कांग्रेस की मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। उनसे किसने इस्तीफा देने को कहा था। क्या वह वास्तव में जनलोकपाल विधेयक पारित कराना चाहते थे। क्या वर्तमान व्यवस्था के चलते ऐसा करना संभव था। क्या भाजपा ने जनलोकपाल के प्रस्ताव पर असहमति व्यक्त की थी। असहमति प्रक्रिया के पालन ना करने पर थी।
दिल्ली में लोकायुक्त की स्थापना मदनलाल खुराना की सरकार ने की थी। क्या यह उचित नहीं होता कि अरविन्द केजरीवाल फिलहाल उसमें संशोधन की बात करते। उसे नई व्यवस्था और माहौल के अनुरूप शक्तिशाली बनाने पर विचार करते। उस पर सहमति बनाने का प्रयास करते। वह इतनी जल्दी में क्यों थे। भ्रष्टाचार मिटाने और भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के अनेक कानून आज भी हैं। अरविन्द  इस दिशा में भी कदम उठा सकते थे। उन्हें इस बार जनलोकपाल पर विफलता मिली। लेकिन उनसे इस्तीफा देने को किसी ने नहीं कहा था। विधानसभा में इस मसले पर बहुमत उनके विरोध में था लेकिन संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार इस पर उनके सामने इस्तीफा देने की बाध्यता नहीं थी। यह ठीक हे कि जनलोपाल पर प्रक्रिया का पालन ना करने का भाजपा और कांग्रेस ने एक साथ विरोध किया था। लेकिन कोई भी सरकार को गिराना नहीं चाहता था। कांग्रेस ने तो ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए लिखित पत्र उपराज्यपाल को सौंपा था। उसे वापस नहीं लिया था। अरविन्द केजवरीवाल को इस्तीफा देने की आवश्यकता ही नहीं थी।
क्या यह सच नहीं कि वह स्वयं मैदान छोड़कर भागना चाहते थे। उन्हें लग रहा था कि कांग्रेस से सहयोग लेना गलत था। चुनाव में कांग्रेस उनकी दुश्मन नम्बर वन थी। आज वह चुनाव में जनलोकपाल बिल पारित कराने के वादे की दुहाई दे रहे हैं। यह उन्हें याद रहा। लेकिन कांग्रेस को समर्थन देने या लेने का वादा क्यों भूल गये। उसके सहयोग से सरकार बनाने की क्या आवश्यकता थी। कम से कम ‘आप’ की यह विश्वसनीयता बनी रहती कि वह बात के पक्के हैं। भाजपा और कांग्रेस दोनों से बराबर दूरी बना कर रहेंगे लेकिन सरकार बनाने के चक्कर में विश्वसनीयता गंवा बैठें वह कह सकते हैं कि सरकार बनाने के लिए जनता की सलाह ली थी। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि इस्तीफा देने के पहले आम आदमी की सलाह क्यों नहीं ली। क्या दिल्ली के आम लोगों से पूछ कर अरविन्द ने जनलोकपाल प्रकरण पर इस्तीफा देने की घोषणा की थी। उन्होंने इस्तीफा देने के लिए ढाई सौ जनसभाओं, लाखों मैसेज और कागजों का सहारा क्यों नहीं लिया। मेसेज इस बार भी हुए लेकिन कार्यकर्ताओं को पार्टी कार्यालय के सामने बुलाने के लिए था यहां बिना किसी सलाह के अरविन्द को अपनी सरकार के इस्तीफे की घोषणा करनी थी। यह विश्वसनीयता की समाप्ति का दूसरा उदाहरण था। वह कांग्रेस का सहयोग लेने के लिए जनमत संग्रह करा सकते हैं। मैदान छोड़ने का निर्णय वह स्वयं कर सकते हैं। दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकती। जबकि कांग्रेस से सहयोग ना लेने की कसम उनकी अपनी थी। उसमें जनमत संग्रह की आवश्यकता नहीं थी लेकिन सरकार बनाने के लिए उसका प्रदर्शन हुआ जिस मसले पर जनमत संग्रह की आवश्यकता थी उस पर निर्णय अपनी मर्जी से कर लिया। उस पर अमल में देर भी नहीं की। अरविन्द जानते थे कि वह जिस प्रक्रिया पर चल रहे हें उससे जनलोकपाल पारित कराना संभव ही नहीं था ना उपराज्यपाल की मंजूरी मिलती ना राष्ट्रपति की। मतलब साफ है-इस्तीफा देने या भागने का निर्णय अरविन्द ले चुके थे। जनलोकपाल का तो केवल बहाना बनाया गया।
यदि अरविन्द केजरीवाल इस्तीफे के पहले जनमत संग्रह कराते तो उन्हें जन आकांक्षा का पता चलता। भ्रष्टाचार गंभीर समस्या है। लोग उसकी समाप्ति चाहते हैं लेकिन इस समय ‘आप’ द्वारा चुनाव में किए गए वोट अधिक महत्वपूर्ण थे। यह कहना गलत है कि उन्हें जनलोकपाल दरे आधी करने तथा प्रतिदिन सात सौ लीटर पानी मुफ्त देने के वादे ने कमाल दिखाया था। इसके अलावा पांच सौ विद्यालय, मोहल्ला समिति की स्थापना, अस्पतालों का निर्माण, घूस लेने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई तथा अस्थायी सरकारी कर्मचारियों को नियमित करने के वादे भी बहुत आकर्षक थे। कांग्रेस के खिलाफ तो हवा थी। उसे सत्ता से बाहर होना था। लेकिन भाजपा वादे के मामले में आप की बराबरी नहीं कर सकी। कौन नहीं चाहेगा कि पानी मुफ्त मिले, बिजली दर आधी रह जाए। भाजपा इतना प्रलोभन नहीं दे सकी। इसके बाद भी वह सबसे बड़ी पार्टी बनी यह आश्चर्यजनक था। ‘आप’ की सरकार से लोग इन्हीं वादों पर अमल कराना चाहते थे। अरविन्द जनलोकपाल की जिद पर इस्तीफा दे यह जनाआकांक्षा नहीं थी।
आप ने अति उत्साह में सरकार तो बना ली लेकिन सत्ता में पहंुचकर उन्हें हकीकत का अनुभव हुआ। वह पहले दिन से भागना चाहते थे। मौका नहीं मिल रहा था। अड़तालिस दिन कट गए, यही क्या कम था। मुफ्त पानी का वादा धोखा साबित हुआ। प्रत्येक व्यक्ति को सात सौ लीटर पानी देने की क्षमता ही दिल्ली में नहीं है। टैंकर वालों ने दाम बढ़ा दिए। एक तिहाई से अधिक आबादी की परेशानी बढ़ गयी। बिजली के दाम आधे करने का वादा भी धोखा साबित हुआ। जनता के धन से बिजली कंपनियों को सब्सिडी दे दी। विकास कार्यों से तीन सौ करोड़ रूपये से अधिक कटौती कर दी गयी। यह तो शुरूआत थी। ‘आप’ सरकार चलती तो विकास कार्यों में यह कटौती पर फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने सरचार्ज बढ़ा दिया। आप सरकार ने एक और धोखा किया। उसके कार्यकर्ताओं ने बिजली बिल नहीं भेजे थे। उन्हें छूट के साथ बिल भरने का तोहफा मिला। जो ईमानदारी से बिल भर रहे थे उन्हें बताया गया कि गलत थे। क्या ‘आप’ का यह कदम ्रन्याय संगत था। दिल्ली सरकार के पास एक इंच जमीन नहीं है। पांच सौ स्कूल कहां खोलते। अस्थायी कर्मचारी तो सामान्य प्रशासनिक आदेश से नियमित हो सकते थे। कोई बाधा नहीं थी। आप ने यह वादा नहीं निभाया। मुद्दा बनाया जनलोकपाल को। इसके नाम से भागने की गारंटी थी। अरविन्द यह ना समझे कि अम्बानी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करके उन्होंने कमाल कर दिया। ऑडिट भी इतनी जल्दी पूरा नहीं होगा। इस दौरान उनकी कंपनियां सब्सिडी देकर लाभ में कमी नहीं होने दी गयी। जनता धोखे में रही। स्पष्ट है कि दिल्ली में आप के तमाशे को लोग समझने लगे थे। लोकप्रियता गिर रही थी। उन्हें लोकसभा चुनाव की चिंता सताने लगी थी। जनलोकपाल पारित कराने की कोई मंशा ही नहीं थी। यह पलायन का प्रस्ताव था।

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यूपी में राजनीतिक सरगर्मियांं उफान पर हैं। लोकसभा 2०14 एजेंडे की तैयारी में लगे राजनीतिक दल रैली, प्रदर्शन और सदन में बहिष्कार को माध्यम बनाकर जनता को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। दिल्ली की कुर्सी तक पहुंचने के लिए यूपी में जनाधार रखने वाली सभी राष्ट्रीय, राज्यीय तथा रजिस्टर्ड पार्टियां रैलियों के सहारे अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटी हुई हैं। देश की सवाज़्धिक 8० सीटों वाले यूपी में मुख्य मुकाबला भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच है। कुछ इलाकों में रालोद, अपना दल, पीस पार्टी जैसे छोटे दल भी चारों प्रमुख पार्टियों को टक्कर देने की स्थिति में हैं।
यूपी में चुनावी तैयारियों के लिहाज से भाजपा और सपा के बीच रैलियों की जोर आजमाइश हो रही है। दोनों दलों के बीच रैलियों को लेकर एक दूसरे को पीछे छोडऩे की होड़ लगी हुई है। भाजपा यूपी में नरेंद्र मोदी की अब तक सात रैलियां कर चुकी है, इसमें जुटी भीड़ ने प्रदेश में हाशिए पर पहुंच चुकी पार्टी के भीतर जान फूंक दी है। कानपुर से शुरू हुआ मोदी की रैलियों का सफर 2 मार्च को लखनऊ में समाप्त होगा। भाजपा कानपुर के अलावा झांसी, आगरा, बनारस, गोरखपुर, मेरठ और बहराइच में मोदी की बड़ी रैलियां करके सोए कार्यकताओ को भी जगाने में सफल रही। हालांकि बूथ लेबल पर पार्टी को अब तक पूरी तरह सफलता नहीं मिली है। कम से कम 25 फीसदी बूथों पर पाटीज़् अपनी इकाई ही नहीं गठित कर सकी है। इसके बावजूद भाजपा को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के लहर में पार्टी यूपी में 35 से 40 सीटों पर जीत हासिल कर सकती है।
समाजवादी पार्टी ने प्रदेश में सवाज़्धिक आठ रैलियां करके सत्ता विरोधी लहर को पीछे छोडऩे की कवायद में जुटी हुई है। घोषणाओं के माध्यम से जनता को अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश भी कर रही है। साथ ही कई योजनाओं का लोकार्पण करने के साथ लैपटॉप वितरण तथा अन्य योजनाओं को पूणज़् करने का प्रचार करके वाहवाही भी लूटने की कोशिश कर रही है। सपा ने मुस्लिम मतों को अपने पक्ष में करने के लिए अल्पसंख्यकों से जुड़े तमाम योजनाओं को लागू भी कर रही है। सपा ने अब तक आजमगढ़, बरेली, मैनपुरी, झांसी, बनारस, गोरखपुर, सहारनपुर और बदायूं में बड़ी रैलियां करके अपने पक्ष में माहौल बनाए रखने की पूरी कोशिश कर रही है। सपा भाजपा का डर दिखाकर लड़ाई दो दलों के बीच ही समेटना चाहते हैं।
प्रदेश में 22 सांसदों वाली कांग्रेस की हालत इस बार काफी नाजुक है। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने पार्टी केखिलाफ माहौल बनाया है। संगठन के भीतर आपसी खींचातान से भी कांग्रेस की स्थिति यूपी में खराब हुई है। प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री तथा बेनी प्रसाद वर्मा के बीच की रस्सा कस्सी से भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचा है। तैयारियों के लिहाज से कांग्रेस अन्य प्रतिद्वंद्वी दलों से काफी पीछे है। यूपी में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की केवल चार रैलियां ही अब तक हो पाई हैं। भीड़ के लिहाज से यह रैलियां बुरी तरफ नाकाम रहीं। प्रदेश में सांगठनिक रूप से कांग्रेस अन्य दलों से काफी पीछे रह गई है। प्रदेश अध्यक्ष लंबे समय तक अपनी कमेटी ही गठित नहीं कर पाए। इसका परिणाम यह रहा कि कांग्रेस अब तक चुनावी लिहाज से अपनी तैयारियों में पिछड़ गई।
यूपी में रैली के नाम पर बसपा ने केवल एक बार भीड़ इक_ा करके सभी विरोधी दलों को चेतावनी दे चुकी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती के जन्म दिन पर 15 जनवरी को बसपा ने लाखों लोगों की भीड़ जुटाकर अपने ताकत का एहसास करा चुकी है। पार्टी ने साल भर पहले ही लोकसभा प्रभारी के रूप में अपने प्रत्याशियों का चयन करके उन्हें तैयारी पूरी करने का मौका दे दिया। हालांकि इस दौरान कुछ सीटों पर प्रत्याशी बदले भी गए किंतु उससे पार्टी की सेहत पर बहुत ज्यादा फर्क  नहीं पड़ा है। बसपा ने बूथ लेबल पर खुद को सबसे मजबूत भी कर चुकी है। अन्य दल रैलियों में व्यस्त थे तो बसपा बूथ इकाइयों के गठन में जुटी हुई थी। संभावना है कि इस बार भी बसपा यूपी में एक बड़ी ताकत रहेगी।
इसके अलावा छोटे दलों में रालोद भी दो बड़ी रैली करके अपनी तैयारियों का जायजा ले लिया है। पीस पार्टी भी दौ रैलियों के माध्यम से पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है। अपना दल ने अभी तक कोई रैली नहीं की, लेकिन प्रभावी इलाकों में पार्टी को मजबूत करने का काम जारी है। आप, कौमी एकता दल, एकता मंच जैसी कई दलों का समूह भी कई सीटों पर फतह करने के लिए अपनी तैयारियों में जुटा हुआ है। हालांकि इन दलों का प्रभाव सीमित इलाकों में है, लिहाजा माना जा रहा है कि यह दल खुद जीतने से ज्यादा बड़े दलों का गणित बिगाडऩे में सफल रहेंगे। हालांकि इनमें से कई चौकाने वाल नतीजे भी दे सकते हैं। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव में परचम फहराने के लिए सभी दल एक दूसरे को पीछे छोडऩे की दौड़ में शामिल हैं।

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