Saturday, December 15, 2018
संपादकीय

भारतीय जनता पार्टी ने अप्रत्याशित बरसात और ओला गिरने से किसानों की फसलों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए प्रदेश की सपा सरकार से 10 हजार रूपये प्रति हेक्टयर के हिसाब से किसानों को तत्काल राहत दिये जाने की मांग की है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डा लक्ष्मीकांत बाजपेयी ने प्रदेश की सपा सरकार को किसान विरोधी बताते हुए कहा कि वर्तमान सरकार में किसान बेहाल है।
डा बाजपेयी ने कहा कि पूरे प्रदेश में हुई बरसात और ओला बृष्टि से किसानो की दलहन, तिलहन, गेहँू तथा आलू की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी है। सरकार को चाहिए था कि 24 घंटे के अन्दर किसानो के फसल के नुकसान का आकलन कर जिलाधिकारी के माध्यम से फौरी तौर पर किसानों को कम से कम 10 हजार रूपये प्रति हेक्टयर के हिसाब से भुगतान कर दिया जाता। सरकार की किसानों के प्रति संवेदनहीनता का परिणाम है कि हमीरपुर के राजा भैइया तिवारी, तथा इन्द्रपाल, उन्नाव के वीरेन्द्र सिंह के अतिरिक्त अलीगढ़ में एक तथा आगरा जनपद में 2 किसानों की फसलो की बर्बादी देखकर सदमे से या आत्महत्या करने से मौत हो गयी। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यादि फसलों की बर्बादी पर तात्कालिक सहायता किसानों को पहुंची होती तो संम्भवत: उपरोक्त मौते न होती।

गन्ना किसानों को 14 दिनों की तय मियाद में भुगतान में लापरवाही बरतने वाली चीनी मिलों पर गन्ना आयुक्त ने सख्त रवैया अपनाया है। भुगतान में कोताही बरतने वाली 11 चीनी मिलों के आवंटित गन्ने को अब तक डायवर्ट किया जा चुका है। गन्ना आयुक्त सुभाष चन्द्र शर्मा ने बताया कि कुंदरकी, थाना भवन, मकसूदापुर, बरखेडा, करीबगंज एवं चांदपुर के कई गन्ना क्रय केन्द्रों के किसानों के गन्ने को दूसरी चीनी मिलो को डायवर्ट कर दिया गया है।
इसके बाद फिर भुगतान की मॉनीटरिंग करने के बाद गोला, खम्बारखेडा, चिलवरिया, बिलारी एवं बेलवाड़ा चीनी मिलों के क्रय केन्द्रों को निकट के चीनी मिलों को भेज दिया गया है। उन्होंने बताया कि दो मार्च तक गन्ना मूल्य के 10913.14 करोड़ के सापेक्ष 7047.35 करोड़ रुपये का ही भुगतान हुआ जो करीब 64 फीसद है। उन्होंने बताया कि बकाया 3865.97 करोड़ रुपये पर 14 दिनों की मियाद बीत जाने के बाद 66 करोड़ का ब्याज भी लगाया है।
प्रदेश में 118 चीनी मिलों में पेराई का काम चल रहा है और अब तक 504.38 लाख कुंटल चीनी का उत्पादन किया जा चुका है। चीनी परता इस वर्ष 9.36 प्रतिशत का है, जबकि पिछले वर्ष यह 9 फीसद पर ही पहुंच पाया था। उन्होंने क्षेत्रीय अधिकारियों को गन्ना मूल्य भुगतान को लेकर सख्ती बरतने को कहा है और मुख्यालय से जारी आदेशों पर तत्काल अमल कराने पर जोर दिया है।

उत्तर प्रदेश की सभी तहसीलों में राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) स्थापित करने की योजना के तहत प्राविधिक शिक्षा विभाग नये वर्ष में 20 आईटीआई खोलने की तैयारी है। प्रदेश के 34 तहसीलों में अभी तक कोई आईटीआई नहीं खुल पाया है। इन असेवित तहसीलों के बाद महकमा हर ब्लाक में एक आईटीआई खोलने की में है। विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि उनके प्रस्ताव को शासन ने सहमति दे दी है और प्रदेश सरकार के 2015-16 के बजट में भी इसका प्रावधान करा लिया गया है।
सरकारी क्षेत्र में एक आईटीआई खोलने के लिए अब करीब साढ़े पांच करोड़ से ज्यादा का व्यय होगा। पहले यह व्यय 4.87 करोड़ रुपये था। उन्होंने बताया कि नये आईटीआई में 12 ट्रेड होंगे और हर ट्रेड में दो-दो यूनिट होगी। इस प्रकार से करीब सभी आईटीआई खुल जाने से सरकारी क्षेत्र में 1000 से ज्यादा सीटें बढ़ेंगी। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में 1560 आईटीआई निजी क्षेत्र के हैं।
इसके साथ ही अब नयी आईटीआई खोलने के की प्रक्रिया में बदलाव कर दिया गया है। इस बदलाव से प्रदेश के बजाय सीधे अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के स्तर से मान्यता देने की ऑन लाइन प्रक्रिया शुरू हो गयी है। इस प्रक्रिया के तहत ही मान्यता लाने वाली आईटीआई की सम्बद्धता प्रदेश स्तर पर बनी कमेटी से की जाती है।

इस्लामाबाद। पाकिस्तान की पूर्व विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने भारत-पाक विदेश सचिव स्तर की वार्ता पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि वर्तमान में दोनों देशों के बीच रिश्ते सबसे खराब स्थिति में है और बातचीत की यह पहल सिर्फ औपचारिकता भर है।
गौरतलब है कि मंगलवार को इस्लामाबाद में भारत और पाकिस्तान में विदेश सचिव स्तर की बातचीत शुरू हो गई है। भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर पाकिस्तान में मौजूद हैं। ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ को दिए इंटरव्यू में हिना ने कहा, “विदेश सचिवों के बीच बातचीत सिर्फ बातचीत भर ही होती है। वो इन बातों से क्या हासिल कर लेंगे। यह सिर्फ बहाना है।”
भारतीय विदेश सचिव एस जयशंकर मंगलवार सुब इस्लामाबाद पहुंचे और उन्होंने एजाज अहमद चौधरी से सार्क देशों के मुद्दों पर बातचीत की।
हिना ने कहा, “सार्क के बहाने यह बातचीत की जा रही है। पिछले 67 सालों में हम इस पर सहमित नहीं बना पाए कि बातचीत कैसे की जाए। भारत-पाकिस्तान के संबंध सबसे खराब स्तर पर हैं।”
पूर्व विदेश मंत्री को आशा है कि एलओसी पर तनाव कम होगा और दोनों देश 2003 के युद्धविराम के एजेंडे को मानेंगे। हालांकि, उनका मानना है कि भारत की ओर से इस मामले में प्रगति कम हुई है। गौरतलब है कि दोनों देशों के बीच बीते कई महीनों से सीमा पर युद्ध विराम का उल्लंघन हुआ है। इसमें सेना के जवान और कई नागरिक मारे गए हैं।
हिना ने कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार दोनों देशों के बीच रिश्ते को लेकर काफी सजग है। बीते एक साल में मोदी सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ जगह उगलकर दुश्मनी का माहौल बनाया है।”
उन्होंने कहा कि यदि मोदी वाकई राजनेता बनना चाहते हैं तो दुष्प्रचार करने के बजाय ऐसे मुद्दों को उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को द्विपक्षीय स्तर पर बातचीत करने से डर लगता है, क्योंकि उसे लगता है कि इससे रिश्तों में कोई सुधार नहीं आता।

मुंबई: महाराष्ट्र में बीफ पसंद करने वाले इसका जायका नहीं ले पाएंगे। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महाराष्ट्र एनिमल प्रिवेंशन (अमेंडमेंट) बिल को मंजूरी दे दी है। अब अगर कोई बीफ बेचते या अपने पास रखे पकड़ा गया तो उसे पांच साल की कैद हो सकती है। इसके अलावा, 10 हजार रुपए के जुर्माने का भी प्रावधान है। यह बिल 19 साल पहले बीजेपी और शिवसेना की सरकार ने 1995 में महाराष्ट्र विधानसभा में पारित किया था। बता दें कि राज्य में महाराष्ट्र एनिमल प्रिवेंशन एक्ट, 1976 के तहत गोहत्या और गोमांस बेचने पर पहले से ही प्रतिबंध है। नए एक्ट की वजह से अब बैल या सांडों को काटना भी कानूनन अपराध होगा।
बीफ के बिजनेस से जुड़े लोगों का कहना है कि इस नए कानून की वजह से न केवल हजारों लोग नौकरी गंवाएंगे, बल्कि कई राज्यों में मीट की कीमत में भी इजाफा होगा। महाराष्ट्र में बीफ के बिजनेस पर मुस्लिमों और खासकर कुरैशी समुदाय का नियंत्रण है। बता दें कि बीफ को आम तौर पर गरीब लोगों का मीट माना जाता है। इसकी कीमत मटन के मुकाबले करीब तीन गुना कम होती है। बीफ के व्यवसाय से जुड़े लोग इस कानून के खिलाफ अब कोर्ट का सहारा लेने के बारे में सोच रहे हैं। सांगली के बीफ ट्रेडर राजेंद्र धेंडे ने बताया कि राज्य में पशुओं के लिए चारा संकट पहले से ही है। अब इस नए कानून की वजह से बूढ़े हो चुके पशुओं की संख्या बढ़ेगी और चारा संकट और बढ़ेगा।
बड़े रेस्टोरेंट पर भी होगा असर
मुंबई के एक बड़े रेस्टोरेंट के शेफ ने बताया कि उनके यहां अधिकतर यूरोपीय कुजीन में इसका इस्तेमाल होता है। यूरोप के अलावा, जापान से आए क्लाइंट्स भी बीफ की डिमांड करते हैं। शेफ के मुताबिक, बियर की बिक्री पर भी असर होगा, क्योंकि बियर के साथ बीफ का कॉम्बिनेशन काफी पसंद किया जाता है।

चंडीगढ़। आम आदमी पार्टी (आप) में खींचतान के बीच योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की कमिटी से हटाना लगभग तय हो गया है। 4 मार्च को होने वाली पार्टी की नेशनल एग्जीक्यूटिव कमिटी की मीटिंग में इस पर फैसला हो सकता है। कमिटी के अधिकांश सदस्य केजरीवाल के संयोजक बने रहने और प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को राजनीतिक मामलों की कमिटी से हटाए जाने के पक्ष में हैं। वहीं, इस मीटिंग में योगेंद्र यादव के खिलाफ पार्टी के खिलाफ खबरें लगवाने के संबंध में केजरीवाल कुछ रिकाॅर्डिंग्स भी पेश कर सकते हैं।

दरअसल, कुछ महीने पहले पंजाब के शहर सुनाम में मीडिया से बातचीत में केजरीवाल के खिलाफ प्रशांत भूषण ने कुछ तंज कसा था। यह बात पार्टी को नागवार गुजरी। वहीं, इसके बाद दिल्ली में एक अंग्रेजी अखबार में पार्टी की अंदरूनी स्थिति के बारे में खबर छपी। इसमें लिखा गया था कि केजरीवाल अपने फैसले पार्टी पर थोप रहे हैं। केजरीवाल ने इस खबर की जांच खुद की। पत्रकार ने बताया कि उन्हें यह खबर योगेंद्र यादव ने दी थी। इसके लिए उन्हें चंडीगढ़ बुलाया गया था। केजरीवाल ने ये बातें रिकॉर्ड कर लीं।

केजरीवाल ने इस बारे में योगेंद्र यादव से पूछा तो उन्होंने पत्रकार से बातचीत करने से इनकार कर दिया। रिकॉर्डिंग सुनाई तो उन्होंने पत्रकार पर झूठ बोलने के आरोप लगाए। अब इसी रिकार्डिंग से पार्टी में विवाद शुरू हुआ। इस विवाद की वजह से यादव पार्टी से निकाले भी जा सकते हैं।
…लोकपाल के लेटर लिखने से शुरू किया खेल
योगेंद्र अौर प्रशांत के खास माने जाने वाले लोकपाल रामदास ने चिट्ठी लिखी कि केजरीवाल अब सीएम हैं, इसलिए उन्हें संयोजक पद छाेड़ देना चाहिए। उम्मीद थी कि पार्टी संयोजक की जिम्मेदारी प्रशांत भूषण या योगेंद्र यादव में से किसी एक को मिलेगी। हालांकि, केजरीवाल ने खुद कमिटी काे पत्र लिखकर संयोजक पद छोड़ने को कहा था, लेकिन पार्टी चाहती थी कि यह पद केजरीवाल अपने पास ही रखें। इसके बाद प्रशांत ने भी कहा, “पार्टी व्यक्ति केंद्रित हो गई है।” आरोप है कि प्रशांत और योगेंद्र ने पार्टी के पत्र मीडिया तक पहुंचाए।
दिलीप पांडे ने की थी शिकायत
योगेंद्र और प्रशांत पर पार्टी के खिलाफ खबरें प्रकाशित करवाने के आरोप पार्टी सेक्रेटरी दिलीप पांडे ने लगाए थे। पांडे केेजरीवाल के करीबी हैं।
आरोप बेबुनियाद: योगेंद्र
योगेंद्र ने फेसबुक पर लिखा, “अब काम करने का वक्त है। पिछले कुछ दिनों से मुझ पर और प्रशांत जी पर आरोप लगाए जा रहे हैं। यह सब काल्पनिक है। ऐसी खबरों पर हंसी आती है। दुख भी होता है।”

 

नई दिल्ली (ब्यूरो)। राजधानी दिल्ली में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (आप) के अंदर कलह रुकने का नाम नहीं ले रही है।
आप के आंतरिक लोकपाल एडमिरल रामदास ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी व केजरीवाल की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस संदर्भ में सीएम अरविंद केजरीवाल और पीएसी सदस्यों को पत्र लिखा है। रामदास का कहना है कि पार्टी में लोकतंत्र नहीं है। इसमें और दूसरी पार्टियों में फर्क नहीं है। पार्टी में गुटबाजी चरम पर है। शीर्ष नेतृत्व दो गुटों में बंट गया है। सरकार में एक भी महिला को जगह नहीं मिली है। उधर पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति पीएसी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की छुट्टी तय मानी जा रही है। इसकी वजह मनीष सिसोदिया और योगेंद्र यादव के बीच अंदरूनी ई-मेल का सार्वजनिक होना और दिल्ली विधानसभा चुनाव के अंतिम दौर में केजरीवाल के खिलाफ प्रशांत भूषण की बयानबाजी को बताया जा रहा है।

जम्मू। शपथ लेने के कुछ देर बाद ही जम्मू-कश्मीर के नए मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के एक बयान ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री सईद ने राज्य में शांतिपूर्ण मतदान के लिए पाकिस्तान, हुर्रियत और आतंकवादियों को श्रेय दिया। उनके इस बयान के खिलाफ पैंथर्स पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस ने मोर्चा खोल दिया है। साथ ही भाजपा भी इस मुद्दे पर विपक्ष के निशाने पर है।
भाजपा-पीडीपी की सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) को जारी करने के लिए हुई प्रेस कांफ्रेंस में मुफ्ती ने कहा कि हुर्रियत के लोग अपने ही हैं। अगर हुर्रियत, पाकिस्तान और आतंकियों ने शांतिपूर्ण चुनाव के लिए माहौल नहीं बनाया होता तो इतना भारी मतदान संभव नहीं था। उन्होंने कहा कि यदि अलगाववादी और आतंकी चुनाव के दौरान कुछ कर देते तो ऐसा मतदान नहीं हो पाता। मुफ्ती के इस बयान के खिलाफ नेशनल कांफ्रेंस और पैंथर्स पार्टी ने मोर्चा खोल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मुफ्ती के बयान पर भाजपा से जवाब मांगा है। वहीं पैंथर्स पार्टी के प्रमुख भीम सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा ने पीडीपी के साथ समझौता कर ऐतिहासिक भूल की है। यह उसी तरह की गलती है जैसी जवाहर लाल नेहरू ने 1947 में और इंदिरा गांधी ने 1975 में शेख अब्दुल्ला से समझौता कर की थी।

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-डा0 दिलीप अग्निहोत्री

agni11चुनाव आयोग ने भाजपा नेता अमित शाह की जनसभा रैलियों और चुनाव प्रचार से प्रतिबन्ध हटा लिया। जबकि सपा नेता आजम खां पर लगा प्रतिबंध अभी जारी रहेगा। जाहिर है कि चुनाव आयोग पर हमला करने का आजम खां को एक और मौका मिला। लेकिन इन दोनों मसलों पर विचार करने से स्पष्ट होगा कि चुनाव आयोग ने अपने दायित्वों का निष्पक्षता से निर्वाह किया। आयोग के संज्ञान में जब शाह और आजम के भाषण का मामला आया, तो उसने दोनों पर समाज रूप से प्रतिबंध लगा दिया। दोनों ने आयोग को जबाव भेजा।
अमित शाह के जबाव पर भी आयोग ने फौरन कोई फैसला नहीं किया। इउसने कई दिन तक इस पर विचार किया। गंभीरता से सभी पक्षों की पड़ताल की गयी। इस बीच अमित शाह खामोश रहे। उन्होंने आयोग के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। उन्होनंे न्यायालय में दी गयी याचिका भी वापस ले ली। अपने मामले की किसी अन्य से तुलना नहीं की।

चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की तुलना सीबीआई से नहीं की। भाजपा ने भी चुनाव आयोग के निर्णय का सम्मान किया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने लखनऊ में कहा कि चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है। उसके विरोध में कुछ भी नहीं करना चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान होना चाहिए। यह देश की संवैधानिक व प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यकता है। अन्यथा अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। अपनी बात कहने का प्रत्येक नागरिक को अधिकार है। वह निर्णय से असहमत हो सकता है। लेकिन अपनी असमति व्यक्त करने का तरीका भी शालीनता वाला होना चाहिए।
अमित शाह के बयान के बाद आयोग ने प्रतिबंध लगाया था। तात्कालिक रूप से यह निर्णय उचित था क्योंकि इसमें बदला लेने की बात कही गयी थी। शाह ने जबाव भेजा। उन्होंने बताया कि वह बदलाव की बात कर रहे थे। शाह गुजराती भाषी हैं इसलिए भी शब्दों का चयन उतना सटीक नहीं हो सकता। यदि इसे बदला भी मान लिया जाये, तब भी यह घृणा फैलाने वाला नहीं था। क्योंकि बदला शब्द वैलेट के साथ जोड़ा गया था। वैलेट से बद

लाव ही हो सकता है। इसका दूसरा अर्थ उन लोगों से बदला लेने का हो सकता है जिन्होंने सत्ता में आने के बाद जन आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया। उनसे यही बदला हो सकता है कि उन्हें सत्ता से बाहर किया जाए। कुछ भी हो आयोग इस जवाब से संतुष्ट हुआ। जिस प्रकार प्रतिबंध लगाने का फैसला उचित था। उसी प्रकार जवाब से संतुष्ट होकर प्रतिबंध हटाने का निर्णय भी उचित था। आयोग की यह कार्यप्रणाली संविधान की भावना के अनुरूप थी। दूसरी तरफ सपा नेता आजम खां का मामला है।

आयोग ने कहा कि आजम खां द्वारा दिए गए जवाब पर सावधानी से विचार किया गया। उनके भाषण की वीडियो रिकार्डिंग दोबारा देखी गयीं आयोग इस निष्कर्ष पर पहंुचा कि उनका भाषण अत्यधिक भड़काऊ था। जिसका असर विभिन्न समुदायों के बीच पहले से बने हुए मतभेदों को बढ़ाने या आपसी नफरत पैदा करने पर पड़ा। जाहिर है कि आयोग ने आजम खां के प्रकरण पर जल्दीबाजी या किसी पूर्वाग्रह से फैसला नहीं किया। पर्याप्त समय लगाकर उनके विवादित भाषण के एक-एक शब्द पर विचार किया। इसके बाद ही उन पर लगाए गए प्रतिबंध को ना हटाने का निर्णय लिया गया।

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-डॉ0 दिलीप अग्निहोत्री

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कार्य कर चुके अधिकारियों की व्यथा छलक रही है। पहले 3 के पूर्व सूचना सलाहकार संजय बारू की किताब प्रकाशित हुई, अब पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख की किताब ‘क्रूसेडर आर कांस्पिरेटर कोलेगेट एण्ड अदर ट्रुथ’ चर्चा मंे है।agni11

कांग्रेस पार्टी ने इन किताबों के समय को लेकर सवाल उठाए हैं। लेकिन समय से अधिक इनकी विषयवस्तु महत्वपूर्ण है। दोनों ही किताबों को चौंकाने वाली विषय वस्तु नहीं है। जो मुद्दे उठाए गये, उन पर मनमोहन सिंह के पूरे कार्यकाल में चर्चा होती रही। ये सभी मुद्दे आम चुनाव मंे भी चर्चा में हैं। किताबें अभी प्रकाशित न होतीं, तब भी इस स्थिति पर फर्क नहीं पड़ता। इस बात पर किसको संदेह था कि मनमोहन सिंह को मौन और कमजोर मान कर दस वर्षों तक प्रधानमंत्री बनाए रखा गया। मनमोहन सिंह के पास करीब चार वर्षों तक कोयला मंत्रालय का प्रभार भी था।

इस अवधि मंे अनियमित ढंग से कोयला ब्लाक के आवंटन किये गये। इनमंें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे। आवंटन के आदेश पर मनमोहन सिंह के हस्ताक्षर थे। उन्हें जिम्मेदारी से मुक्त कैसे किया जा सकता है। यह माना जा सकता है कि लेन-देन में उनकी हिस्सेदारी नहीं थी, लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें भ्रष्टाचार और गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी। दोनों किताबों में यही बातें उठाई गयीं। क्या यह सही नहीं कि मनमोहन सिंह से जो अपेक्षा उन्हें कुर्सी पर बैठाने वालों ने की थी, वह उसे पूरा कर रहे थे। अन्यथा सब कुछ जानते हुए भी वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली फाइलों पर हस्ताक्षर क्यों कर रहे थे। क्या प्रधानमंत्री का निजी रूप मंे ईमानदार होना पर्याप्त है। क्या इतने से ही उसका
संवैधानिक दायित्व पूरा हो जाता है। मनमोहन सिंह लाखों करोड़ के घोटाले रोक नहीं सके। रोकने की बात दूर, वह उसमें सहयोगी बने थे।
जाहिर है कि किताबों के समय को लेकर सवाल उठाने का औचित्य नहीं है। इन किताबों के प्रकाशन का यह उचित समय था। नई सरकार बनाने के बाद इनका सामने आना गलत होता। जो बातें मनमोहन सिंह के साथ जुड़ गयीं थीं, उन्हीं का उल्लेख इन किताबों मंे है। पहले विपक्ष का आरोप माना गया, अब मनमोहन के साथ काम करने वालों की जुबानी है। इन पूर्व अधिकारियों ने अपने दायित्वों को पूरा किया। वह पद पर रहते हुए फैसले बदल नहीं सकते थे, लेकिन चुनाव के समय उन्होंने सच्चाई सामने लाकर अच्छा काम किया है।
पारेख ने अपनी किताब में कोयला आवंटन को खासतौर पर विषयवस्तु बनाया है। मनमोहन सिंह से संबंधित अन्य सभी बातों पर बहस हो सकती है।

यहां तक कि दूसरे बड़े घोटाले टू-जी स्पेक्ट्रम पर उनके सीधे जुड़ाव पर बहस की जा सकती है। उस दौरान ए. राजा संचार मंत्री थे। मनमोहन पर यह आरोप अवश्य लग सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से पहले उन्होंने ए. राजा का बचाव किया था। लेकिन कोलगेट घोटाले में मनमोहन सीधे तौर पर जवाबदेह है। पारिख ने किताब में उल्लिखित मुद्दों को पहले भी उठाया था। कोयला सचिव के रूप मंे उन पर आरोप तय किये गये थे। इस पर पारेख ने कहा था कि उन्हंे चार्टशीट दी जा सकती है तो प्रधानमंत्री भी बरी नहीं हो सकते। प्रत्येक संदिग्ध फाइल पर उन्हांेने अंतिम निर्णय लिया था उन पर मनमोहन सिंह के ही हस्ताक्षर थे।
पीसी पारेख की दलीलों मंे सच्चाई है। इस प्रकरण में कहा जा सकता है कि पारेख ने अपने दायित्व का निर्वाह किया। उन्हांेने प्रधानमंत्री तथा कोयला मंत्रालय के प्रभारी को विधिसम्मत सलाह दी। सचिव से ऐसा करने की ही अपेक्षा की जाती है। लेकिन मनमोहन सिंह ने उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया। वह जानते थे कि कोल आवंटन ठीक ढंग से नहीं हो रहा है। इसमंे बड़े घोटाले की गुंजाइश है। फिर भी मनमोहन सिंह ने मौन रहकर हस्ताक्षर करने मंे भलाई समझी।
पारेख की किताब के इन अंशों को संजय बारू की किताब से जोड़कर देखिए। संजय बारू ने लिखा था कि प्रधानमंत्री कार्यालय की फाइलें अंतिम निर्णय के लिये सोनिया गांधी के पास जाती थीं। दोनों किताबें अलग-अलग लेखकों की हैं। लेकिन दोनों प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित थे। दोनों वहां चलने वाली गतिविधियों के गवाह थे। सूत्र एक थे, इसलिए कथानक जुड़ा हुआ है। संजय बारू का कथानक पीसी पारेख की किताब में स्वाभाविक रुख से आगे बढ़ता है। दोनों एक दूसरे की पुष्टि करते दिखाई देते हैं। यह साफ होता है कि प्रधानमंत्री क्यों मौन रहते थे। वह पद पर बने रहने की कीमत चुका रहे थे। मंत्री उनके निर्णयों को बदल देते थे। मंत्रियों के ऊपर किसका हाथ था, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। अन्यथा वह अपने प्रधानमंत्री की ऐसी अवहेलना कैसे कर सकते थे।
कोलगेट एंड अदर ट्रुथ मंे सच्चाई को सामने लाया गया। मनमोहन सिंह पर सीधा आरोप है। पारिख ने कहा कि प्रधानमंत्री चाहते तो कोयला घोटाला रोक सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। कोयला सचिव ने प्रधानमंत्री को नीलामी के द्वारा कोल आवंटन करने की लिखित सलाह दी थी। मनमोहन पहले इस बात से सहमत थे। यदि नीलामी से आवंटन किये जाते तो सरकार को आर्थिक लाभ मिलता। सरकारी कोष मजबूत होता। लेकिन प्रधानमंत्री दबाव मंे झुक गये।

उन्होंने भ्रष्टाचार बढ़ाने वाली प्रक्रिया को स्वीकार किया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने घोटाला करने वालों का बचाव किया। मनमोहन सिंह को बताना चाहिए उन्हांेने ई-मार्केटिंग और नीलामी से आवंटन की सलाह को खारिज क्यों किया। वह गलत दबाव को अस्वीकार क्यों नहीं कर सके। वह आरोपियों को क्यों बचा रहे थे। मनमोहन सिंह की इस मंशा पर विपक्ष ने ही आरोप नहीं लगाए थे, वरन सुप्रीम कोर्ट ने भी कोलगेट की जांच अपनी निगरानी मंे कर ली थी।

मनमोहन सरकार के प्रति यह न्यायिक अविश्वास था। मनमोहन सिंह सरकार के संबंध मंे जो आमधारणा थी, पीसी पारिख ने उसे प्रमाणित किया है। इस बात पर कोई संदेह नहीं था कि संप्रग सरकार पर प्रधानमंत्री का नियंत्रण नहीं था। उनके विफलताओं व घोटालों के बाद भी उन्हें पद पर बनाए रखा गया। इसका एक कारण यह भी था कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी से भाग रहे थे। वह चुनौती स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं थे। इसके बाद मौन रहने वाले मनमोहन को ही बनाए रखने में सुविधा देखी गयी।

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