Friday, October 19, 2018
फिल्म रिव्यू

फिल्म अपने पहले ही सीन से कॉमेडी के ट्रैक को कस कर पड़क ले तो वह कपिल शर्मा की फिल्म कहलाती हैं। इस फिल्म के शुरु होने के कुछ पलों बाद ये अहसास आपको भी हो। मौजूदा दौर में टेलिविजन की दुनिया के सुपरस्टार कॉमेडियन कपिल शर्मा की खासियत ही यही है कि वो किसी सुपरफास्ट लग्जरी कार की तरह कुछ सेकेंड्स में ही 0 से 100 की स्पीड पकड़ लेते हैं। इस फिल्म के बारे में कुछ और बताने से पहले जरा एक नजर डाल लें इसकी कहानी पर जो बहुत सारे उतार-चढ़ाव और घुमाव भरी है।
कहानी : तो शरुवात यहाँ से होती है हालात हर बार ऐसे बने कि कुमार शिव राम किशन (कपिल शर्मा) को एक दो नहीं, बल्कि तीन-तीन शादियां करनी पड़ती है । बेचारे शिव राम किशन की तीनों बीवियां जूही (मंजरी फडनीस), सिमरन (सिमरन कौर मुंडी) अंजली ( साईं लोंकर) एक ही बिल्डिंग के अलग-अलग फ्लोर पर रहती हैं। शर्मा जी की इन तीनों बीवियों को कानो कान खबर नहीं है कि शिव, राम और किशन तीन अलग आदमी नहीं, बल्कि एक ही आदमी के तीन नाम हैं। दूसरी ओर शर्मा जी की एक गर्लफ्रेंड दीपिका (एली अवराम) भी है। इसी ट्रैक पर धीरे-धीरे आगे खिसकती कहानी के कई मोड़ पर अलग-अलग टिवस्ट आते हैं। तीनों बीवियों के साथ वक्त गुजारने के मकसद से शिव हर बार अलग-अलग बहाने मारता है। एसआरके की मुसीबत उस वक्त बढ़ती है, जब शिव की प्रेमिका दीपिका (एली अवराम) एकबार फिर से उसकी लाइफ में लौटती है। इस बार शर्मा जी अपने पहले प्यार को भी खोना नहीं चाहते और दीपिका से भी जल्दी शादी करने का वादा कर बैठते हैं। दूसरी ओर शिव के माता-पिता (शरत सक्सेना और सुप्रिया पाठक) भी नहीं जानते कि उनके बेटे ने क्या गुल खिला रखे है।

ऐक्टिंग : अगर बिग स्क्रीन पर पहली बार ऐक्टिंग के मापदंड पर रखकर कपिल शर्मा को परखा जाए तो उनकी तारीफ करनी होगी कि उन्होंने कमजोर और लाचार स्क्रिप्ट को अपने दम पर इंटरवल तक खूब संभाला है। हां, कपिल कभी-कभी ७० एमएम के पर्दे पर कॉमिडी नाईट्स जैसा माहौल बना देते हैं। सिमरन कौर मुंडी, साईं लोकर, मंजरी फडनीस, अरबाज खान हर किसी ने अपने किरदार के हिसाब से ठीकठाक काम किया है। यह बात अलग है कि कपिल को छोड़ दूसरे कलाकारों को ज्यादा फुटेज नहीं मिल पाई। वरुण शर्मा ने कमाल का अभिनय किया है।इस वीकेंड आप कपिल के साथ टाइमपास कर सकते हैं।

निर्देशन : अब्बास मस्तान ने अपने ट्रैक से अलग हटकर इस बार ऐसी स्क्रिप्ट पर काम किया जो नब्बे के दशक की याद दिलाती है। इंटरवल से पहले तो फिल्म एक ट्रैक पर ठीकठाक रफ्तार से आगे चलती है, लेकिन बाद में रोचकता कम होने लगती है। अगर अब्बास मस्तान कपिल को उनके टीवी शो से बाहर निकालकर अलग ट्रैक पर फिल्म बनाते तो यकीनन उनकी यह फिल्म कपिल के कॉमिडी शो से बेहतर बनती । कुल मिलकर एक अच्छी कोशिश की गई है

रेटिंग: २ स्टार
कलाकार: कपिल शर्मा, मंजरी फडणिस, सिमरन कौर मुंडी, साईं लोकुर, एली एवराम, अरबाज खान, वरुण शर्मा, सुप्रिया पाठक
निर्देशन: अब्बास-मस्तान

आजकल फिल्मों को बेहतर या और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए कहानी-पटकथा की गुणवत्ता पर द्यान कम, बल्कि कुछ अन्य चीजों का तवज्जो ज्यादा दी जाने लगी है। इनमें से एक चीज है फ्लैशबैक। अगर कुशलता से और जरूरत के हिसाब से रचनात्मक ढंग से इसका इस्मेमाल किया जाए तो फिल्म में मजा आता है, उत्सुकता बनी रहती है। लेकिन अगर कहीं निर्देशक इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं या फिर सही ढंग से फिल्म में प्रयोग करने से चूक जाते हैं तो ‘कट्टी बट्टी’ जैसी फिल्म बनती है। वो कैसे, ये जानने से पहले जरा एक नजर फिल्म की कहानी पर।

ये कहानी है माधव काबरा (इमरान खान) उर्फ मैडी और पायल (कंगना रनौत) की। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं। मैडी को पायल से पहली ही नजर में प्यार हो जाता है। पहली ही मुलाकात में वो पायल को आई लव यू बोल देता है और लगे हाथ शादी का प्रस्ताव भी दे डालता है। नखरेबाज पायल के आगे-पीछे दो-तीन दर्जन चक्कर लगाने के बाद आखिरकार बात बन जाती है और दोनों मुंबई आकर लिव-इन में रहने लगते हैं। एक दिन पायल अचानक घर छोड़ कर चली जाती है। बहुतेरा ढूंढने के बाद भी जब मैडी को पायल नहीं मिलती तो वह एक दिन तनाव में फिनायल पी लेता है। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया जाता है, जहां से डिस्चार्ज होने के बाद उसकी बहन कोयल उसे अपने साथ ले जाती है।

पायल को गए छह हफ्ते हो चुके हैं और मैडी की इस हालत से उसके सारे यार-दोस्त परेशान हैं। एक दिन मैडी को पता चलता है कि पायल दिल्ली में है और उसकी शादी रिक्की से होने वाली है। रिक्की इन दोनों का एक कॉलेज फ्रेंड है, जिसकी कभी मैडी ने खूब पिटाई की थी। बिना किसी नाम पते के मैडी पायल को ढूंढता दिल्ली आ जाता है। काफी जद्दोजेहद के बाद वह किसी तरह वह विवाह स्थल पर भी पहुंच जाता है और शादी को रोकने की कोशिश भी करता है, लेकिन ऐन मौके पर पहुंच कर पायल उसे अपना जबाव एक तमाचे से देती है।

हक्का-बक्का निखिल वहां से वापस चला जाता है, लेकिन उसे अब भी विश्वास है कि पायल उससे अब भी प्यार करती है। कोयल मैडी को फिर समझाती है कि उसे पायल को भूल जाना चाहिए। तभी मैडी को कोयल के बैग से एक कंगन मिलता है, जो कभी मैडी की मां ने पायल को दिया था। मैडी को समझते देर नहीं लगती कि पायल, कोयल और उसके सारे दोस्स उससे कुछ छिपा रहे हैं। आखिर वो कौन सी बात या वजह है, जिससे पायल उससे दूर जाना चाहती है। कोयल जब मैडी को असलियत बताती है तो वह पूरी तरह से टूट जाता है। अब आप कहीं ये तो नहीं समझ रहे कि ये कोई सस्पेंस फिल्म है, जिसमें नायक से नायिका के बारे में कुछ छिपाया जा रहा है।

बेशक, ये एक रोम-कॉम यानी रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म ही, लेकिन इस कहानी को जिस ढंग से बयां किया गया है, वो किसी जलेबी से भी ज्यादा टेड़ा-मेढ़ा है। कॉलेज में एक लड़का-लड़की के मिलने का सीन और उनके बीच नया-नया पनपा प्यार देख कर लगता है कि निर्देशक ने लेखन को तवज्जो दी ही नहीं है। अब नायिका, नायक को छोड़ कर चली गयी है और वो देवदास बन गया है। किसी को नहीं पता कि नायिका क्यों और कहां गयी है। ये तमाम बातें बेहद घिसी-पिटी और पुराने ढर्रे के फॉर्मूले से प्रेरित हैं।

न जाने आज की यंग जेनरेशन इसे एक मिनट भी बर्दाश्त कैसे कर पाएगी। मैडी, पायल के जाने से लगभग पागल सा हो गया है, लेकिन पागल लगता नहीं है। वो काम पर जाता है और सिर्फ अपने दोस्त से लड़ता रहता है। एक बच्चे की तरह उसने सबकी जिंदगी हिलाकर रख दी है। मजे की बात है कि इस पूरे झगड़े से पायल का कुछ लेना-देना है ही नहीं, क्योंकि वो सो किसी सीन में है ही नहीं। अगर है तो सिर्फ फ्लैशबैक्स में। केवल यादों में। ये फ्लैशबैक इतनी तेजी से आते-जाते हैं कि अच्छे और प्रभावी कर, बल्कि झुंझलाहट ज्यादा पैदा करते हैं।

उसके ऊपर इमरान का बासी अभिनय। ऐसा लगता ही नहीं कि इस कलाकार की आप कोई नई फिल्म देख रहे हों। कंगना का किरदार उनकी पिछली फिल्म च्तुन वेड्स मनु र्टिन्सज् का शहरी वर्जन है। यानी तनूजा त्रिवेदी कानपुर से निकल मुंबई जाकर कैसी लगेगी, ये दखना है कि आप च्कट्टी बट्टीज् की पायल को देख लीजिए। ये फिल्म अपनी थोड़ी बहुत लाज केवल अंत के 15-20 मिनट में ही बचा पाती है, जब पायल के दूर जाने की असली वजह सामने आती है। उसे भी ज्यादातर दर्शक पहले ही समझ लेंगें, क्योंकि दर्द का ये फॉर्मूला बरसों पुराना है। खुद निखिल आडवाणी इसी फॉर्मूले से कभी रातों रात चमके थे।

फिल्म का गीत-संगीत भी बस औसत दर्जे का ही है। याद नहीं पड़ता कि कोई गीत गुनगुनाने लायक भी हो। फिर भी गीत च्लि टू लिप..ज् का फिल्मांकन आकर्षित करता है। ये एक नए कॉन्सेप्ट का गीत है, जिसे फिल्म च्फुकरेज् के एक गीत लग गयी लौटरी…और फिल्म च्उंगलीज् के एक गीत उंगली पे नचाले…में भी दर्शाया गया है। इस नए कॉन्सेप्ट में जमीन या दिवार पर हल्का-फुल्का सेट डिजाइन, रंगों का इस्तेमाल और ग्राफिक एवं एनिमेशन की मदद से एक स्टोरीबोर्ड तैयार किया जाता है, जिसे संगीत के साथ मैच किया जाता है।

कुल मिलाकर ‘कट्टी बट्टी’ एक बेहद निराश करने वाली फिल्म है, जो पुरानी और बेजान कहानी के अलावा अपने ट्रीटमेंट और बोरिंग अभिनय से केवल सिरदर्द देती है और कुछ नहीं।

रेटिंग : 1.5 स्टार
कलाकार : कंगना रनौत, इमरान खान
निर्देशक : निखिल आडवाणी
निर्माता : सिद्धार्थ राय कपूर
गीत : कुमार
संगीत : शंकर-अहसान-लॉय
कहानी : अंशुल सिंघल, निखिल आडवाणी

रोहित तिवारी/ मुंबई ब्यूरो। बॉलीवुड इंडस्ट्री के नामचीन निर्देशक निखिल आडवाणी ऑडियंस को पहले “पटियाला हाउस”, “डी-डे” जैसी कई फिल्में दे चुके हैं। अब वे अपने चाहने वालों की बीच फिल्म “हीरो” लेकर आए हैं। यह एक रोमांटिक और एक्शन फिल्म है, जिसमें निखिल ने अपने गजब के निर्देशन से ऑडियंस को काफी कुछ मसाला देने की भरपूर कोशिश की है।

कहानी:
मायानगरी को दमदार तरीके से दिखाते हुए, बोले तो… हर वो चीज जिससे है मुंबई की पहचान, अब शुरू होती है कहानी…। सूरज (सूरज पंजोली) 35 साल के हो गए हैं, लेकिन उनकी शादी नहीं हुई है। उसे कई लोग समझाते हैं, लेकिन वो अपनी वही पुरानी ख्यालों में बिजी रहता है। वहीं दूसरी तरफ राधा (अथिया शेट्टी) आईजी माथुर (तिग्मांशु धूलिया) की बेटी दोनों ही अपने सच्चे प्यार की तलाश में निकल पड़ते हैं। इधर, सूरज यानी सूर्यकांत पाशा (आदित्य पंचोली) का बेटा होता है, जो गलत तरीके से आई आमदनी को वह गरीब और लाचार लोगों में बांटता है। लेकिन किन्हीं कारणों से पाशा जेल में होता है। अब आईजी की परेशानी के तहत पाशा अपने बेटे सूरज का यूज करता है और पाशा को लगता है कि वह सफल हो गया, जबकि सूरज को राधा से हकीकत में प्यार हो जाता है और वह राधा के कहे अनुसार ही करता है। लेकिन आईजी माथुर सूरज को रंगे हाथों पकड़ लेते हैं और इसी के साथ फिल्म में तरह-तरह के ट्विस्ट आते हैं और कहानी एक गजब मोड़ के साथ आगे बढ़ती है।
अभिनय:
बी-टाउन के नवोदित एक्टर सूरज पंचोली ने वाकई में अपने अभिनय में गजब का प्रयास किया है और साथ ही अथिया शेट्टी ने भी अपनी पहली ही फिल्म से यह साबित कर दिखाया है कि वाकई में उनके खून में अभिनय का अच्छा कीड़ा है। साथ ही ये दोनों नवोदित स्टार्स ऑडियंस की वाहवाही लूटने में भी काफी हद तक सफल से दिखाई दिए। जहां शरद केलकर, तिग्मांशू धूलिया और आदित्य पंचोली अपने-अपने अभिनय में बाजी मारते दिखाई दिए, वहीं सलमान खान भी आखिरी में एक गाने की बदौलत ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कुछ हद तक सफल रहे। लेकिन शरद व तिग्मांशू को अभिनय में कुछ और बेहतर करने की जरूरत सी भी दिखाई दी। इसके अलावा सलमान खान ने अपने “मैं हूं हीरो तेरा” गाने से ऑडियंस को इस फिल्म की ओर आकर्षित करने का दमदार प्रयास भी किया है।
निर्देशन:
निखिल आडवाणी इस फिल्म से अपने चाहने वालों को आकर्षित करने में काफी हद तक सफल रहे। इस तरह से उन्होंने साबित कर दिखाया है कि अगर कहानी बेहतर हो तो फिल्म में न्यू कमर्स को भी दमदार मौका दिया जा सकता है। उन्होंने अपने निर्देशन में रोमांस और एक्शन का गजब तड़का लगाया है, लेकिन कहीं-कहीं पर वे थोड़ा असफल भी रहे। इस रोमांटिक फिल्म में निखिल ने वाकई में कुछ अलग करने की दमदार कोशिश की है, इसीलिए वे ऑडियंस की वाहवाही बटोरने में भी सफल रहे। कुछ एक जगह भले ही इनकी स्क्रिप्ट थोड़ी डगमगाती सी दिखाई दी, लेकिन इसकी कहानी ने ऑडियंस को फिल्म के आखिर तक बांधे रखा। वैसे उन्होंने इससे यह तो जरूर प्रूव कर ही दिखाया है कि बॉलीवुड के प्रेमी आज भी रोमांटिक और बेहतरीन कहानियों के कायल हैं। बहरहाल, कॉमर्शियल अंदाज की बात की जाए तो सिनेमेटोग्राफी भी कुछ खास करने में थोड़ा असफल भी रही है। साथ ही पूरी फिल्म में कहीं न कहीं कोरियोग्राफी की कमी भी नजर आई। संगीत (जिगर, अमाल अलिक, मीत ब्रदर्स अंजान, जस्सी कात्याल और सचिर्न) तो ऑडियंस को भाता भी है, लेकिन गाने की तुलना में थोड़े और प्रयास की जरूरत भी नजर आई।
क्यों देखें:
नवोदित स्टार्स के अभिनय और एक दमदार रोमांटिक विथ एक्शन फिल्म देखने के लिहाज से सिनेमा घरों का रुख किया जा सकता है। इसके अलावा सलमान खान के चाहने वालों को भी उदास नहीं होना पड़ेगा। आगे इच्छा आपकी…!
बैनर : सलमान खान फिल्म्स, इरोज इंटरनेशनल, मुक्ता आट्र्स लि. और इमेय एंटरटेंमेंट प्रा. लि.
निर्माता : सलमान खान और सुभाष घई
निदेशक : निखिल आडवाणी
स्टोरी : सुभाष घई
जोनर : रोमांस
गीतकार : सलमान खान, राहत फतेह अली खान, मीत ब्रदर्स अंजान, भूमि त्रिवेदी, सुनैना सिंह, मोहित चौहान, प्रिया पांचाल, अर्पिता चक्रवर्ती, तनिष्का, अमाल मलिक, पलक मुच्छल, राहुल पांडे, शालमली खोलगडे, दिव्या कुमार, जिगर, देव नेगी, शिप्रा गोयल और अरमान मलिक।
संगीत: जिगर, अमाल अलिक, मीत ब्रदर्स अंजान, जस्सी कात्याल और सचिन।
स्टारकास्ट : सूरज पंचोली, अथिया शेट्टी, शरद केलकर, सलमान खान, तिग्मांशू धूलिया आदित्य पंचोली।

कहते हैं कि ठोकर लगने के बाद इंसान की अक्ल ठिकाने आ जाती है। अनीज बज्मी के साथ भी यही हुआ लगता है। वर्ना कॉमेडी फिल्मों के नाम पर च्नो प्रॉब्लमज् (2010) और च्थैंक्यूज् (2011) जैसा सिरदर्द परोसने वाले अनीस को तो लोग कब का भूल गये थे। अब लगभग चार साल के बाद वह च्वैलकम बैकज् के साथ लौटे हैं, जो 2007 में आयी उन्हीं की फिल्म च्वैलकमज् का सीक्वल है।

इस साल आयी फिल्म च्तनु वेड्स मनु रिटर्न्सज् के बाद ये दूसरी ऐसी फिल्म कही जा सकती है, जिसका अपने पहले भाग से सीधा संबंध है। न केवल किरदारों के मामले में, बल्कि कहानी के स्तर पर भी यह सही मायने में एक सीक्वल लगता है।

इस दूसरे भाग में मजनूं भाई (अनिल कपूर) भी है और उदय शेट्टी (नाना पाटेकर) भी। फर्क है तो बस इतना कि अब ये दोनों भाई लोग, भाईगिरी छोड़ कर गांधीगिरी करने लगे हैं। सात साल पहले अपनी बहन की शादी के बाद इन्होंने सारे बुरे काम छोड़ दिये हैं। हालत ये हो चली है कि छोटे-मोटे गुंडे भी अब इनसे हफ्ता वसूलने लगे हैं। ये सब देख मजनूं से तो रहा नहीं जाता है और अपने पुराने दिन याद कर करके दिन में बीस बार उसकी रगों में उबाल आता रहता है। हालांकि ऐसा ही उबाल कभी-कभी उदय की रगों में भी आता है, लेकिन उसका चेला बल्लू (मुश्ताक खान) भाई कंट्रोल, भाई कंट्रोल कहकर उसे शांत करा देता है।

एक दिन उदय-मजनूं को ये अहसास होता है कि अब उन्हें भी शादी कर लेनी चाहिए। और इस अहसास की वजह है राजकुमारी ऑफ नजफगढ़ (अंकिता श्रीवास्तव), जिसे देखते ही दोनों को उससे प्यार हो गया है। लेकिन इस राजकुमारी की असलियत वे दोनों नहीं जानते। ये राजकुमारी, बेटी है महारानी ऑफ नजफगढ़ (डिंपल कपाड़िया) की, जिनके दिन आजकल मुफलिसी में कट रहे हैं।

अब कहानी में ट्विस्ट ये है कि मजनू-उदय अपनी शादी के बारे में सोच ही रहे हैं कि अचानक से उदय का पिता आ जाता है। साथ में ले आता है इन दोनों की एक बहन, जिसका नाम है रंजना (श्रुति हसन)। अब उन्हें इसकी शादी करानी है। हैरान-परेशान उदय-मजनूं पहुंच जाते हैं डॉ. घुंघरू (परेश रावल) के यहां। उन्हें लगता है कि शरीफ लड़का तो उनके घर ही मिलेगा। इधर, डॉ. घुंघरू के घर भी एक रेडीमेड बेटा तैयार बैठा है। नाम है अज्जू भाई (जॉन अब्राहम), जो छटा हुआ गुंडा है। अज्जू, मिसेज घुंघरू (सुप्रिया कार्निक) के गुजरे जमाने की एक च्भूलज् की देन है, जिसकी झल्लाहट डॉ. घुंघरू अभी ठीक से निकाल भी नहीं पाता कि धड़ाधड़ा नई-नई मुसीबतें आने लगती हैं।

उदय-मजूनं, अज्जू की असलियत से अनजान हैं। लेकिन ये राज अज्जू-रंजना की सगाई वाले दिन खुल जाता है। सगाई टूट जाती है। कहानी आगे बढ़ती वॉन्टेड (नसीरूद्दीन शाह) की धमाकेदार एंट्री के साथ, जिसके इकलौते गंजेड़ी बेटे सनी (शाईनी आहूजा) का दिल रंजना पर आ गया है। उदय-मजनूं के लिए डबल मुसीबत हो जाती है। वो तो अज्जू जैसे गुंडे से पीछा छुड़ा कर आये थे, यहां तो डॉन का बेटा पीछे पड़ गया है। अब बेचारे दोनों करें तो क्या करें..

करीब आधा दर्जन लोगों की टीम के साथ निर्देशक ने कहानी तो लगभग ठीक-ठीक ही गढ़ ली है। ढेर सारे कलाकारों को संभाल लेना अनीस की खासियत रही है। उन्हें लगता है कि इससे दर्शकों को मनोरंजन का डोज बराबर मिलता रहता है, इसलिए परिचय और किरदारों को पुख्ता करने के चक्कर में उन्होंने समय नहीं गंवाया है और पहले ही सीन से कॉमेडी का भरपूर अटैक किया है। इस हमले में ग्लैमर पक्ष हावी रहा है, जिसकी बौछार की जिम्मेदारी अंकिता और श्रुति पर डाली गयी है। वैसे भी इन दोनों का ही अभिनय सबसे ज्यादा निराश करने वाला है।

च्वैलकम बैकज् की खासियत है, जिसके चुटीले जोक्स। नाना का ये कहना- च्बेटा गन और गुण की स्पैलिंग एक ही होती है, ध्यान रखिये…ज् नसीर साहब का एक संवाद- च्अरे हम तो शिकार पर कई दिनों से गए ही नहीं, फिर से गोली किसने चला दी…ज् या फिर परेश रावल का ये कहना- च्अरे जब मैंने वोट दिया ही नहीं तो मेरा मुख्यमंत्री कहां से आया…ज् ऐसे और भी ढेर जोक्स है, जो पल पल में हंसाते-गुगुदाते हैं।

इसके अलावा फिल्म में नाना-अनिल की कैमिस्ट्री भी जबरदस्त दिखती है। जैसे कब्रिस्तान का एक सीन। ज्योतिषी वाला सीन, जिसमें ये दोनों अपने-अपने ढंग से कुंडलियां सेट करवाने पर जोर डालते हैं। इसके अलावा एक अंधे डॉन के रूप में नसीरूद्दीन शाह ने भी बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कॉमेडी का तंबू उन्होंने ही थामे रखा है। दुबई के आलीशान होटलों और निजी आईलैंड्स पर शूट किये गे सीन्स अच्छे लगते हैं। बड़े परदे पर मुफ्त का ये पर्यटन बुरा नहीं है।

हां, कमी खलती है तो फिल्म की लंबाई की, जिस पर कई जगह बड़े प्यार से कैंची चलाई जा सकती थी। खासतौर से क्लाईमैक्स में। यहां लंबे सीन्स है। ढाई घंटे से ऊपर की यह फिल्म अपने गीत-संगीत से बांध नहीं पाती। गीत केवल देखने में आकर्षित करते हैं। एक-दो गीत कम भी किये जा सकते थे, जिनके बोल, चालू और कहीं-कहीं भद्दे किस्म के हैं।

बहुत ज्यादा लॉजिक वगैराह के चक्कर में न पड़ें तो आजकल ऐसी ही कॉमेडी फिल्में आ रही है, जिनकी कहानी में च्तुकज् की गुंजाइश न के बराबर रहती है। वैसे भी हमारी हिन्दी फिल्मों में सिर पर चोट लगने से याद्दाश्त आती-जाती रहती है, आंखें भी खोई-पायी गयी है और मेले में बिछुड़ कर सालों बाद फिर से मिलने की कहानियां तो सुल्वर जुबली हुई हैं। ये फिल्म भी कुछ ऐसे ही अनपचेबल रास्तों से होकर गुजरती है, इसलिए इसे च्वैलकम बैकज् कहने में कोई बुराई तो नहीं दिखती।

रेटिंग : 3 स्टार
कलाकार : अनिल कपूर, नाना पाटेकर, जॉन अब्राहम, श्रुति हसन, परेश रावल, डिंपल कपाडिम्या, नसीरूद्दीन शाह, शाईनी आहूजा, अंकिता श्रीवास्तव, सुप्रिया कार्निक, आदि ईरानी, मुश्ताक खान
निर्देशन : अनीस बज्मी
निर्माता : सुनील ए. लुल्ला, फिरोज नाडियाडवाला
कहानी : अनीस बज्मी, राजीव कौल
संवाद : राज शांडिल्य
पटकथा : राजीव कौल, प्रफुल्ल पारिख, राजन अग्रवाल, अनीज बज्मी

उमेश बिस्ट निर्देशित फिल्म “ओ तेरी” शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई। फिल्म का निर्माण अभिनेता सलमान खान के जीजा अतुल अग्निहोत्री ने किया है। फिल्म में घोटालों की “बू” आती है। स्कैंडल के साथ साथ फिल्म में मीडिया, सरकार और पॉलीटिकल लीडर्स की मिलीभगत को भी दिखाया गया है।

कहानी

फिल्म में दो रिपार्टस “पीपी (प्रंताभ प्रताप) और एड्स (आनंद इश्वाराम देवदत्त सुब्रमण्यम) की कहानी है। पीपी का किरदार पुलकित सम्राट ने अदा किया है जबकि एड्स के रोल में बिलाल अमरोही है। पीपी और एड्स रातों रात स्टार बनने की ख्वाहिश रखते है। वे चाहते है कि उन्हें जल्द से जल्द शोहरत मिले। इसके लिए वह मनगढ़ंत कहानियां शूट करते है जिनका कोई तुक नहीं होता।

इनकी उल जुलूल कहानियों से तंग आकर इनकी बॉस मोनसून (सारा देन डियास) इन्हें नौकरी से निकाल देती है। उधर, स्पोट्स कमेटी के चेयरमैन का रोल अदा कर रहे अनुपम खेर आगामी एशियन गेम्स को लेकर प्लानिंग कर रहे है।

पीपी और एड्स नौकरी वापस चाहते है इसके लिए वह एक्सक्लुजिव करने की तलाश में है। ब्रेकिंग की तलाश में खुद को एक स्कैम में फंस हुआ पाते है। जहां उनको एहसास होता है मीडिया का काम लोगों तक सच पहुंचाना है। बस यहीं से शुरू होती है दोनों मुश्किलें। इनकी मदद करता है मनोज पाहवा। पाहवा एक ठेकेदार के रोल मे है। अब यह जानना चाहते हो कि पीपी और एड्स किस तरह मुश्किलों को सामना करते है और सच दुनिया के सामने लाते है। इसके लिए सिनेमाघरों का रूख करना होगा।

परफोर्मेंस
पुलकित सम्राट अपने रोल में जमें है। वह अपने स्टूपिड हरकतों से दर्शकों को हंसाने में कामयाब रहे है। बिलाल ने ठीक ठाक अदाकारी है। कहीं जगह वह असहज नजर आए है। अनुपम खेर, सारा देन डियास और सारा लॉरेन की कलाकारी दर्शकों को जरूर पसंद आएगी।

ऑवरऑल
फिल्म के डॉयलॉग सिनेमाघरों में हलचल मचा देंगे। चैनल हैड मोनसून जब पीपी और एड्स से कहती है, “लोगों को स्कैंडल चाहिए, स्कैम चाहिए… रेप, डकैती… ये सब कुछ हो तो लाओ वरना शक्ल मत दिखाना”। वहीं जब पीपी एड्स को स्कैंडल के बारे में समझाता है, जब छोटे लोग चोरी करते है तो वो चोरी होती है, मगर जब बड़े लोग चोरी करते है तो वे स्कैम कहलाता है। अनुपम खेर भी डॉयलॉग बाजी में पीछे नहीं रहे है। वे कहते है, “ये आज की युवापीढ़ी है, जब इनकी बत्ती लगती है तो यह सिर्फ मोमबत्ती जला सकते है, इंडिया गेट पर”।

फर्स्ट हॉफ दर्शकों को बांधे रखता है जबकि सैकंड हॉफ में लगता है कि डायरेक्टर फिल्म को खत्म करने की जल्दी में है।

कलाकार: पुलकित सम्राट, बिलाल अमरोही, अनुपम खेर, सारा लॉरेन, सारा देन डियास

निर्देशक : उमेश बिस्ट

मुंबई।

प्रमुख कलाकार: सिद्धार्थ मल्होत्रा, परिणीति चोपड़ा और अदा शर्मा।

निर्देशक: विनिल मैथ्यू।

संगीतकार: विशाल-शेखर।

फिल्म के अंग्रेजी हिज्जे का उच्चारण करें तो यह फिल्म ‘हसी तो फसी’ हो जाती है। यह इरादतन किया गया होगा। धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म है तो अक्षर जोड़ने के बजाय इस बार घटा दिया गया है। फिल्म का यही प्रभाव भी है। फिल्म में बस मनोरंजन का अनुस्वार गायब है। फिल्म मनोरंजन की जगह मनोरजन करती है। हिंदी में बिंदी का बहुत महत्व होता है। अंग्रेजी में हिंदी शब्दों के सही उच्चारण के लिए बिंदी के लिए ‘एन’ अक्षर जोड़ा जाता है। करण जौहर की भूल या सोच स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन इस फिल्म के साथ अनुराग कश्यप भी जुड़े हैं। अफसोस होता है कि भाषा और उच्चारण के प्रति ऐसी लापरवाही क्यों?

‘हंसी तो फंसी’ गीता और निखिल की कहानी है, जो अपने परिवारों में मिसफिट हैं। उनकी जिंदगी परिवार की परंपरा में नहीं है। वे अलग सोचते हैं और कुछ अलग करना चाहते हैं। गीता संयुक्त परिवार की बेटी है, जिसमें केवल उसके पिता उसकी हर गतिविधि के पक्ष और समर्थन में खड़े मिलते हैं। निखिल को अपनी मां का मौखिक समर्थन मिलता है। संयोग कुछ ऐसा बनता है कि दोनों बार-बार टकराते हैं। आखिरकार उन्हें एहसास होता है कि अलग मिट्टी से बने होने के कारण वे प्यार और जिंदगी में एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

फिल्म के प्रोमो और प्रचार से अगर आपने सोच रखा हे कि यह परिणीति चोपड़ा की एक और चुहलबाजी होगी तो मुमकिन है कि निराश होना पड़े। ‘हंसी तो फंसी’ स्वयं में रोचक है, लेकिन वही फिल्म नहीं है, जो भ्रम देती है। यह ए किस्म की रोमांटिक कामेडी है। इस फिल्म में परिणीति चोपड़ा का उपयोग प्रचलित छवि से अलग किया गया है। परिणीति चोपड़ा ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। वही फिल्म का आकर्षण हैं। निखिल की भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा मिसफिट लगते हैं। उनकी देहयष्टि, भावमुद्रा और चाल-ढाल से ऐसा व्यक्तित्व बनता है, जिससे कभी कोई चूक नहीं हो सकती। उनकी बेवकूफियां सहज नहीं लगतीं। इस फिल्म में अदा शर्मा चौंकाती हैं। उन्हें ठीक-ठाक भूमिका मिली है। ‘हंसी तो फंसी’ के प्लस प्वॉइंट मनोज जोशी हैं। मीता के मूक समर्थन में उनका अव्यक्त दुलार जब फूटता है तो परिजन स्तब्ध रह जाते हैं। हम लोग मनोज जोशी को हास्यास्पद या मामूली किरदारों में देखते रहे हैं। वे साबित करते हैं कि किरदार और दृश्य मिलें तो उनकी अदाकारी दिख सकती हैं। शरत सक्सेना और बाकी सहयोगी कलाकार फिल्म की जरुरतें पूरी करते हैं।

अवधि-141 मिनट

मुंबई।

प्रमुख कलाकार: एरिका फर्नाडिस, साहिल आनंद और सुमित सूरी।

निर्देशक: नीला माधब पांडा।

संगीतकार: बिशाख-कनीश।

शहरों की दौड़ती-भागती जिंदगी में युवक-युवतियों की बड़ी उलझन और समस्या प्यार, संबंध और समर्पण है। हर संबंध के लिए गहरी समझदारी के साथ परस्पर विश्वास अनिवार्य है। पसंद और आकांक्षाएं भी एक सी हों तो रिश्तों के पनपने के लिए समान भूमि मिल जाती है। यह फिल्म दिल्ली के कुछ युवक-युवतियों के जरिए प्यार और समर्पण तलाशती हुई एक ऐसे मुकाम पर पहुंचती है, जहां सच के आभास से डर पैदा होता है ओर उसके एहसास से प्रेम और विश्वास जगता है।

जतिन और तमन्ना की शादी होने वाली है। शादी से पहले जतिन दोस्तों के साथ पहाड़ों की सैर को निकलता है। तमन्ना को भी एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में पहाड़ों पर जाना है। तय होता है कि दोनों वहां मिलेंगे। तमन्ना तुनकमिजाज और पजेसिव किस्म की युवती है। वह जतिन को कभी कुछ कहने का मौका नहीं देती। हमेशा उलाहने और डांट से ही उनकी मुलकातें खत्म होती हैं? जतिन समर्पित प्रेमी की तहर हमेशा उसकी सुनता रहता है। पहाड़ों के सफर में उसके साथ हैरी और रोहन भी है। उनकी अपनी समस्याएं हैं। यात्रा की रात बैचलर पार्टी में जतिन की मुलाकात नताशा से हो जाती है। उन्हें सुधि नहीं रहती। नशे की हालत वे हमबिस्तर हो जाते हैं। बाद में भी नताशा से मुलाकातें होती हैं। नजदीकियां बढ़ती हैं। इसके साथ ही उसकी दुविधा बढ़ती जाती है। एक रहस्य गाढ़ा होता है। उनकी मौज-मस्ती और मुश्किलों के बीच कहानी बढ़ते-बढ़ते एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती है, जहां जतिन स्तब्ध होने के साथ लाचार दिखता है। उसी लाचारी में उसे प्रेम का एहसास होता है।

नीला माधब पांडा और लेखक संजय चौहान ने फिल्म में समाज के एक जरूरी और गंभीर मुद्दे को खूबसूरती से पिरोया है। इंटरवल तक अनुमान नहीं रहता कि पिल्म उद्देश्यपूर्ण मोड़ लेगी। लगता ही नहीं कि साधारण सी लग रही युवा समूह की उलझनों की कहानी में सार्थक पेंच आ जाएगा। नीला माधब पांडा अपने उद्देश्य में सफल होते हैं। इस मकसद तक पहुंचने में उन्होंने नाहक प्रचलित फॉर्मूला का इस्तेमाल किया है। मीका सिंह का आइटम सॉन्ग और बंजारा डांस फिल्म के भाव के लिहाजा से अनावश्यक पैबंद लगते हैं।

फिल्म का गीत-संगीत प्रयोगधर्मी और प्रभावशाली है। गीतकार प्रतीक मजूमदार और संगीतकार बिशाख-कनीश ने मधुर गीत-संगीत संयोजन किया है। कलाकारों में नताशा की भूमिका निभा रही अभिनेत्री एरिका फर्नाडिस अपने किरदार की वजह से याद रह जाती हैं। साहिल आनंद और सुमित सूरी अपनी भूमिकाओं के संग न्याय करते हैं।

‘बबलू हैप्पी है’ साधारण और सहज रूप एक जरूरी मुद्दे को रोचक तरीके से फिल्म में ले आती है। यही इस फिल्म की खासियत है। इस मकसद और प्रयास के लिए लेखक संजय चौहान और निर्देशक नीला माधब पांडा की सराहना करनी होगी। प्रस्तुति में कुछ कमियों और अनावश्यक चतुराई का आभास होता है। उद्देश्य की वजह से उसे अनदेखा किया जा सकता है।

अवधि-114 मिनट

मुंबई।

प्रमुख कलाकार: शरमन जोशी, माही गिल, अनुपम खेर और मीरा चोपड़ा।

निर्देशक: सतीश कौशिक।

सतीश कौशिक को रीमेक फिल्मों का उस्ताद निर्देशक कहा जा सकता है। आम तौर पर वे दक्षिण भारत की फिल्मों की रीमेक निर्देशित करते रहे हैं। इस बार उन्होंने अंकित दत्ता की बंगाली फिल्म ‘भूतेर भविष्यत’ को हिंदी में ‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ नाम से बनाया है। हिंदी फिल्म के मिजाज के मुताबिक उन्होंने मूल फिल्म में थोड़ा बदलाव किया है। देश भर के दर्शकों को रिझाने की फिक्र में उन्होंने विषय और प्रस्तुति का गाढ़ापन छोड़ दिया है। फिल्म थोड़ी हल्की हो गई है, फिर भी विषय की नवीनता और सिद्ध कलाकारों के सहयोग से मनोरंजन करने में सफल रहती है।

‘गैंग ऑफ घोस्ट्स’ भूतों के भविष्य के बहाने शहरी समाज के वर्तमान की कहानी है। मुंबइ में मॉल और मल्टीप्लेक्स कल्चर आने के बाद पुराने बंगले और मिल टूटते जा रहे हैं। उजाड़ बंगलों को अपना डेरा बनाए भूतों की रिहाइश का संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे में भूत संगठित होकर कुछ करना चाहते हैं। ‘रागिनी एमएमस-2’ की तरह यहां भी एक फिल्म बनती है, जिसमें भूतों का एक प्रतिनिधि ही लेखक बन जाता है। वह अपने समय के किरदारों की भूतियापंथी रचता है।

मूल फिल्म के निर्देशक अंकित दत्ता की आपत्तियों और शिकायतें अपनी जगह माकूल होंगी। सतीश कौशिक ने हिंदी दर्शकों की अभिरुचि के अनुसार थोड़ा बदलाव किया है। सेठ गेंदामल के साथ बीते जमाने के अन्य किरदारों को अच्छी तरह गढ़ा गया है। इसमें समाज के हर तबके के किरदार हैं। सतीश कौशिक ने उनके परिवेश और संवाद के माध्यम से दर्शकों को हंसने की विसंगतियां दी हैं। फिल्म वर्तमान पर कटाक्ष करने के साथ अपने दौर को भी नहीं बख्शती।

अनुपम खेर लंबे समय के बाद अपनी भूमिका के प्रति गंभीर नजर आते हैं। माही गिल ने अतीत की अभिनेत्री के अंदाज के साथ आवाज को भी परफॉरमेंस में अच्छी तरह उतारा है। अन्य भूमिकाओं में राजपाल यादव, असरानी, यशपाल शर्मा आदि समुचित सहयोग करते हैं। मीरा चोपड़ा में नयी नवेली की अनगढ़ता है। जैकी श्राफ और चंकी पांडे ऐसी भूमिकाएं कई बार निभा चुके हैं।

इस फिल्म का गीत-संगीत कमजोर है। वीनस की फिल्म में यह कमी खलती है। पिछले दशकों में उनकी फिल्मों का संगीत दर्शकों को झुमाता रहा है।

अवधि- 128 मिनट

मुंबई ।

प्रमुख कलाकार -फरहान अख्तर, विद्या बालन, वीर दास, राम कपूर, रति अग्निहोत्री, इला अरुण, पूरब कोहली

निर्देशक-साकेत चौधरी

पति,पत्‍‌नी और इच्छाएं न तो फरहान अख्तर और न विद्या बालन,दोनों में से कोई भी कामेडी के लिए चर्चित नहीं रहा। निर्देशक साकेत चौधरी ने उन्हें शादी के साइड इफेक्ट्स में एक साथ पेश करने का जोखिम उठाया है। फरहान अख्तर की पिछली फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ रही है। उसके पहले भी वे अपनी अदाकारी में हंसी-मजाक से दूर रहे हैं। विद्या बालन ने अवश्य घनचक्कर में एक कोशिश की थी,जो अधिकांश दर्शकों और समीक्षकों के सिर के ऊपर से निकल गई थी। साकेत चौधरी ने शादी के साइड इफेक्ट्स में दोनों को परिचित किरदार दिए हैं और उनका परिवेश घरेलू रखा है। इन दिनों ज्यादातर नवदंपति सिड और तृषा की तरह रिलेशनशिप में तनाव,दबाव और मुश्किलें महसूस कर रहे हैं। सभी शिक्षा और समानता के साथ निजी स्पेस और आजादी की चाहत रखते हैं। कई बा लगता है पति या पत्‍‌नी की वजह से जिंदगी संकुचित और सीमित हो रही है। निदान कहीं और नहीं है। परस्पर समझदारी से ही इसे हासिल किया जा सकता है,क्योंकि हर दंपति की शादीशुदा जिंदगी के अनुभव अलग होते हैं।

सिड और तृषा अपनी शादीशुदा जिंदगी में ताजगी बनाए रखने के लिए नए एडवेंचर करते रहते हैं। वे नित नए तरीके अपनाते हैं। उनकी हैपनिंग शादी में बेटी के आगमन से झटका लगता है। सिड को लगता हैकि तृषा उसके हर काम और एक्शन में कोई कमी निकालती रहती है। वह धीरे-धीरे खुद को तृषा और घरेलू जिंदगी से दूर करता है। रणवीर की उल्टी-सीधी सलाह से उसकी दिक्कतें और बढ़ती हैं। शादी संभालने के चक्कर में वह और गलतियां करता है। तृषा भी नहीं भूल पाती है कि बेटी के आगमन से उसे प्रमोशन और नौकरी छोड़नी पड़ी। दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहराने पर भी कुढ़ते रहते हैं। उनकी शादीशुदा जिंदगी पहले की तरह खशहाल नहीं रह जाती। आखिकर उन्हें एहसास होता है कि कहीं और जाने या सलाह करने से बेहतर है कि खुद को समझाएं और भरोसा रखें। सुलह होने के बाद हम फिर देखते हैं कि आदतन पति-पत्‍‌नी में से एक निजी तफरीह के लिए पुन: झूठ बोलने से बाज नहीं आता।

साकेत चौधरी ने पति-पत्‍‌नी के बीच की गलतफहमियों और मुश्किलों को एडल्ट कामेडी नहीं होने दिया है। सचमुच यह रोमांस से अधिक रिलेशनशिप की कामेडी है। फरहान अख्तर और विद्या बालन ने बहुत संजीदगी से अपने किरदारों को जिया है। वे हंसाने के लिए हरकतें नहीं करते हैं। उनकी हरकतों पर हंसी आती है। दोनों अपने संबंधों को लेकर गंभीर और चिंतित हैं। उनकी उलझनों में सादगी है। अभिनय की दृष्टि से दोनों की संगत और टाइमिंग सही है। परफारमेंस में वे पूरक भूमिकाएं भी अदा करते हैं।

हिंदी में ऐसी कामेडी फिल्में नहीं बनी हैं। रिलेशनशिन कामेडी में हमेशा एक वो रहती या रहता है। यहां भी वो है,लेकिन वह कोई व्यक्ति नहीं है। सिड और तृषा की इच्छाएं ही वो हैं। हालांकि फिल्म में रणवीर कहता है कि अफयर तो अफेयर है। चाहे वह व्यक्ति से हो या खुद से ़ ़ ़ समाज में किसी दूसरी या दूसरे से हुए अफेयर को ही अफेयर माना जाता है,जबकि हम में से ड्यादातर दांपत्य जीवन में किसी और अफेयर की वजह से पार्टनर को कम समय और महत्व देकर अपनी जिंदगी की रिक्तता बढ़ाते रहते हैं।

अवधि-145 मिनट

मुंबई

प्रमुख कलाकार : माधुरी दीक्षित और जूही चावला

निर्देशक : सौमिक सेन

संगीतकार : सौमिक सेन

स्टार : 3

सौमिक सेन की ‘गुलाब गैंग’ में गुलाबी साड़ी पहनी महिलाएं समूह में चलती हैं तो उनमें किसी झरने की गति और चंचलता नजर आती है। बेधड़क सीमाओं को तोड़ती और नए सितारों को छूती गंवई महिलाओं के अधिकार और समस्याओं की ‘गुलाब गैंग’ माधुरी दीक्षित और जूही चावला की अदाकारी और भिड़ंत के लिए भी देखी जा सकती है।रज्जो को पढ़ने का शौक है। उसकी सौतेली मां पढ़ाई की उसकी जिद को नहीं समझ पाती। वह उसे घरेलू कामों में झोंकना चाहती है। यही रज्जो बड़ी होकर शिक्षा को मिशन बना लेती है। वह गुलाब गैंग आश्रम की स्थापना करती है।

अपने गैंग की लड़कियों की मदद से वह नारी संबंधित सभी अत्याचारों और आग्रहों से लड़ती है। अपनी ताकत से वह पहचान बनाती है।

यहां तक कि स्थानीय राजनीतिज्ञ सुमित्रा देवी की निगाहों में आ जाती है। सुमित्रा देवी की अपनी ताकत बढ़ाने के लिए रज्जो को साथ आने का ऑफर देती है, लेकिन रज्जो सामने आना बेहतर समझती है। यहां से दोनों की भिड़ंत आरंभ होती है।लेखक-निर्देशक और संगीतकार सौमिक सेन की त्रिआयामी प्रतिभा में संगीतकार फिल्म पर ज्यादा हावी रहा है। संगीत का सुंदर उपयोग है, लेकिन फिल्म के मसालेदार संरचना में वह योग नहीं करता। संगीत और नृत्य पृथक रूप से उत्तम होने के बावजूद फिल्म की गति को धीमी करता है। गीतों में रज्जो की ऊर्जा को शब्द नहीं मिल पाते।’गुलाब गैंग’ मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों की प्रौढ़ अभिनेत्रियों के लिए रची गई कहानी है। माधुरी दीक्षित ने रज्जो और जूही चावला ने सुमित्रा देवी के किरदार को सही रंग दिया है।

रज्जो के जोश को माधुरी दीक्षित पर्दे पर ले आती हैं। वहीं साजिश रचती सुमित्रा देवी की चालाकी को जूही चावला सटीक अंदाज देती है। दोनो जब-जब एक फ्रेम में आई है, उन्होंने दृश्यों को प्रभावशाली बना दिया है।सौमिक सेन ने फिल्मों में गैंग की गतिविधियों को तरजीह दी है। सामूहिकता पर बल देने के कारण वे हिंदी फिल्मों की परिपाटी से बाहर निकल जाते हैं। अगर रज्जो की केंद्रीयता को परिभाषित किया जाता तो फिल्म अधिक प्रभावशाली हो जाती। फिल्म के दृश्य संयोजन और विषय में हल्का बिखराव है। शायद निर्देशक हिंदी फिल्मों के ढांचे से निकलना चाहते हो और सुदृढ़ छलांग न लगा सके हों।फिल्म के कुछ दृश्यों में संवादों का तेजाबी इस्तेमाल हुआ है। खासकर माधुरी दीक्षित और जूही चावला के आमने-सामने के दृश्यों में दोनों कलाकारों के अनुभव सिद्ध परफॉर्मेस से हम प्रभावित होते हैं।

अवधि-149 मिनट

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