Tuesday, December 11, 2018
बिजनेस

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थोक मूल्यों पर आधारित मुद्र्रास्फीति लगातार चौथे माह शून्य से नीचे रही। खाद्य पदार्थ, ईंधन और विनिर्मित उत्पादों के दाम घटने से फरवरी में मुद्र्रास्फीति शून्य से 2.06 प्रतिशत नीचे रही।थोक मुद्रास्फीति के शून्य से नीचे बने रहने के बीच उद्योग जगत ने नीतिगत ब्याज दर में कटौती का सिलसिला जारी रखने की मांग की है। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्र्रास्फीति की दर जनवरी में शून्य से 0.39 प्रतिशत नीचे रही। इससे पहले दिसंबर में यह शून्य से आधा प्रतिशत और नवंबर में शून्य से नीचे 0.17 प्रतिशत रही। इससे पहले फरवरी 2014 में मुद्र्रास्फीति दर 5.03 प्रतिशत थी। मुद्र्रास्फीति के शून्य से भी नीचे जाने का मतलब है चीजों के दाम पिछले वर्ष के मुकाबले कम हुए हैं। इक्रा की वरिष्ठ अर्थशासत्री आदिति नायर ने कहा कि फरवरी के थोक मूल्य सूचकांक के उम्मीद से भी नीचे आंकड़े आने के बावजूद अप्रैल में आने वाले मौद्र्रिक नीति समीक्षा में दरों में कटौती की संभावना कम ही है। वर्ष 2015 की शेष अवधि में अब हमें रेपो दर में केवल आधा प्रतिशत और कटौती की उम्मीद लगती है।ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार खाद्य वस्तुओं के वर्ग में मुद्र्रास्फीति 7.74 प्रतिशत है जबकि विनिर्मित उत्पादों के समूह में यह 0.33 प्रतिशत रही। ईधन और बिजली समूह में मुद्र्रास्फीति फरवरी में शून्य से नीचे 14.72 प्रतिशत तक चली गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम घटने से मुद्र्रास्फीति की गणना में शामिल ईधन समूह की मुद्रास्फीति में भारी गिरावट आई है। इसका असर समग्र आंकड़े पर पड़ा है। खाने पीने की वस्तुओं में प्याज, दालों और प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ जैसे अड़े, मीट और मछली के दाम कुछ बढ़े हैं वहीं सब्जियों, फलों और दूध के दाम में फरवरी माह में घटे हैं। सब्जियों की मुद्र्रास्फीति फरवरी में 15.54 प्रतिशत रही जो कि जनवरी के 19.74 प्रतिशत के मुकाबले कुछ कम है। आलू के दाम सालाना आधार पर 3.56 प्रतिशत घट गए जबकि जनवरी में इसमें 2.11 प्रतिशत वृद्धि हुई थी। डेलॉयट (इंडिया) के वरिष्ठ निदेशक अनिस चक्रवर्ती ने कहा कि खाद्य मुद्रास्फीतिमें गिरावट अल्पावधि वाली हो सकती है क्योंकि बेमौसमी वर्षा का उत्पादन पर पहले ही असर पड़ना शुरू हो गया है। हमें उम्मीद है कि सरकार इस मामले में सक्रियता के साथ काम करेगी क्योंकि खाद्य मुद्र्रास्फीति अगले महीने से बढ़नी शुरू हो सकती है।उद्योग जगत ने सरकार से मांग बढ़ाने के उपायों को जोर शोर से आगे बढ़ाने को कहा है। इसके साथ ही रिजर्व बैंक से आने वाले महीनों के दौरान दर में कटौती जारी रखने का आग्रह किया है। उद्योग मंडल फिक्की ने कहा है कि सरकार और रिजर्व बैंक को बैंकों पर इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि प्रमुख नीतिगत दर में जो कटौती पहले की जा चुकी है उसका लाभ निवेशकों और ग्राहकों कर्ज पर ब्याज दरें कम करने के रूप में दिया जाना चाहिए। एसोचैम ने कहा कि सरकार को औद्योगिक और उपभोक्ता मांग बढ़ाने के लिए तुरंत कारवाई की जरूरत है। ब्याज दरों में कमी और कर्ज की आसानी से उपलब्धता सरकार और रिजर्व बैंक की शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।

थोक मुद्रास्फीति के शून्य से नीचे बने रहने के बीच उद्योग जगत ने नीतिगत ब्याज दर में कटौती का सिलसिला जारी रखने की मांग की है। विशेषज्ञ हालांकि इस मामले में सतर्कता बरत रहे हैं और उनका मानना है कि हाल के दिनों में हुई बेमौसमी वर्षा से इसमें बाधक हो सकती है और मुद्र्रास्फीति जल्द फिर चढ़ सकती है और रिजर्व बैंक ब्याज दर में कटौती रोक सकता है। रिजर्व बैंक सात अप्रैल को जब मौद्र्रिक नीति की अगली समीक्षा करेगा तो वह थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़ों पर उसे गौर करना चाहिए। रिजर्व बैंक इससे पहले जनवरी और मार्च में दो बार में प्रमुख नीतिगत दर रेपो में 0.50 प्रतिशत कमी कर चुका है। हालांकि उद्योग जगत इसमें और कमी की मांग कर रहा है। खाद्य मुद्रास्फीतिमें गिरावट अल्पावधि वाली हो सकती है क्योंकि बेमौसमी वर्षा का उत्पादन पर पहले ही असर पड़ना शुरू हो गया है।

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फरवरी के थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति के आंकड़े, वैश्विक संकेतक तथा संसद का चालू सत्र इस सप्ताह शेयर बाजार की दिशा निर्धारित करेगा। शेयर बाजार विशेषज्ञांे ने यह बात कही है। उन्होंने कहा कि इसके अलावा विदेशी निवेशकों के निवेश का रुख, डॉलर के मुकाबले रुपए का उतार चढ़ाव और अमेरिका द्वारा ब्याज दरांे में बढ़ोतरी को लेकर चर्चा भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण कारक होंगे। रेलिगेयर सिक्योरिटीज लिमिटेड के खुदरा वितरण विभाग के अध्यक्ष जयंत मांगलिक ने कहा कि इस सप्ताह कारोबारी कंपनियों के अग्रिम कर आंकड़े पर ध्यान देंगे जो मार्च 2015 को समाप्त होने वाली चौथी तिमाही के नतीजों के बारे में संकेत प्रदान करेंगे। संसद के चालू सत्र के घटनाक्रम पर भी कारोबारियों की करीबी नजर होगी। व्यापक आर्थिक मोर्चे पर थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति के आंकडों को सोमवार को जारी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि वैश्विक घटनाक्रमांे में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) की दो दिन की बैठक 17 और 18 मार्च, 2015 को होगी। निवेशकों को फेडरल रिजर्व की प्रमुख जैनेट एलेन की इस बैठक की प्रतीक्षा है जिसमें मौद्रिक नीति की भविष्य की दिशा के बारे में कोई संकेत प्राप्त हो सकता है। बोनान्जा पोर्टफोलियो के सहायक कोष प्रबंधक ने कहा कि आम बजट के बाद बाजार की नजर सबसे ज्यादा फेडरल रिजर्व की ओपन मार्केट कमेटी की बैठक पर है। यह बैठक इसी सप्ताह होनी है। कारोबारियों को इस बैठक में ब्याज दरें बढ़ने की आशंका है क्योंकि अमेरिका में रोजगार के आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे हैं और आर्थिक स्थिति में सुधार आ रहा है। ऐसे में इस सप्ताह नरमी रह सकती है। बीते सप्ताह बंबई शेयर का सेंसेक्स 945.65 अंक अथवा 3.21 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्शाता बंद हुआ। जिन अन्य घटनाक्रमांे पर निवेशकांे की निगाह होगी अमेरिका के फरवरी माह के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े 16 मार्च को आने हैं। बैंक आफ जापान की दो दिन की मौद्रिक समीक्षा बैठक 17 और 18 मार्च को होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) में कार्यरत विकास अधिकारियों (डीओ) को औद्योगिक विवाद कानून के प्रावधानों के तहत कामगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्र और न्यायमूर्ति प्रफुल्ल सी. पंत की खंडपीठ ने इस संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया है। हाईकोर्ट ने कहा था कि बीमा निगम के विकास अधिकारियों को कामगार नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि औद्योगिक विवाद कानून की धारा 2 (एस) के तहत जीवन बीमा निगम के विकास अधिकारी कामगार नहीं है और इसलिए उसे हाईकोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि नजर नहीं आती कोर्ट जीवन बीमा निगम के कुछ विकास अफसरों की अपील पर सुनवाई कर रहा था। इन अधिकारियों ने हाईकोर्ट के फैसले का ेचुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायाधिकरण के फैसले को उलट दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विकास अधिकारियों को संबंधित कानून के तहत कामगार नहीं माना जा सकता है और इसलिए श्रमिक अदालत को इस विवाद की सुनवाई का अधिकार नहीं है। न्यायाधिकरण में बीमा निगम ने इस कार्यवाही की विचारणीयता पर सवाल उठाते हुए दलील दी थी कि विकास अधिकारियों को इस कानून के तहत कामगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। लेकिन न्यायाधिकरण ने विचारणीयता के मुद्दे को अस्वीकार करते हुए इस मामले में विकास अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया और निर्देश दिया था कि उन्हें वेतनमान में बहाल करने के साथ ही बकाया राशि का भुगतान किया जाए।

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नई दिल्ली। केंद्रीय बजट 2015-16 में पर्यटन क्षेत्र को तवज्जो नहीं मिलने से पर्यटन क्षेत्र निराश है। क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि सहूलियत तो मिली नहीं, उल्टे सेवा कर की दर बढ़ा दी गई है। पर्यटन क्षेत्र की बात करें तो इसमें बस-कार उपलब्ध कराने से लेकर, होटल, रेस्टोरेंट, हवाई जहाज और रेल गाड़ी में वातानुकूलित श्रेणी में यात्रा सभी क्षेत्र में सेवा कर लगता है।
इंडियन एसोसिएशन ऑफ टूर आपरेटर्स (आईएटीओ) के अध्यक्ष सुभाष गोयल का कहना है कि सरकार इस तथ्य को समझ रही है कि पर्यटन इस समय सबसे अधिक मात्रा में विदेशी मुद्रा कमा कर दे रहा है, तब भी इस क्षेत्र की उपेक्षा की गई है। आईएटीओ ने सरकार से मांग की थी कि जिस तरह से माल के निर्यात पर सहूलियतें मिलती हैं, उसी तरह से पयर्टन क्षेत्र से जुड़ी सेवाओं को भी डीम्ड एक्सपोर्ट माना जाए और आमदनी के हिसाब से सेवा कर से छूट मिले। लेकिन इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। उल्टे क्षेत्र पर सेवा कर का बोझ बढ़ा दिया गया।
उनका कहना है कि अब होटल में ठहराना महंगा हो गया, रेस्टोरेंट में खाना-पीना महंगा हो गया। पर्यटकों के घूमने फिरने के लिए इंतजाम किये जाने के लिए टैक्सी-बस किराये पर लेना महंगा हो गया, हवाई जहाज और रेलगाड़ियों में वातानुकूलित श्रेणी का किराया महंगा हो गया। इसका प्रभाव पैकेज की कीमतों पर पड़ेगा और जब पैकेज महंगा होगा तो पर्यटकों की संख्या उस हिसाब से नहीं बढ़ पाएगी जैसा अनुमान है।
हालांकि उन्होंने इस बात के लिए सरकार की प्रशंसा की है कि टूरिस्ट वीजा ऑन अराइवल सेवा के लिए इलेक्ट्रानिक ऑथराइजेशन योजना को 43 देशों से बढ़ा कर 150 देशों तक बढ़ाया जाएगा। उन्होंने मंदिरों के शहर वाराणसी और जालियांवाला बाग समेत दस धरोहर स्थलों में सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए बजट प्रावधान किए जाने का भी स्वागत किया है।

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नई दिल्ली। पेट्रोलियम पदार्थों, विशेष कर डीजल एवं पेट्रोल पर केंद्रीय करों में फेरबदल से उद्योग जगत, खास कर मंझोले और छोटे (एमएसएमई) उद्यमियों को झटका लगा है। इस बदलाव से हालांकि इनके लिए डीजल की दरों में तो कोई फेरबदल नहीं हुआ है, लेकिन उनके इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हो गई है।
केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा शनिवार को संसद में पेश किए गए वित्त विधेयक में डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले अप्रत्यक्ष कर में फेरबदल किया गया है। इसका विवरण बजट में नहीं था, लेकिन केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड ने जो विवरण जारी किया, उससे उद्यमियों को झटका लगा क्योंकि इससे उनका ईंधन खर्च बढ़ गया है। अनब्रांडेड पेट्रोल पर सेनवेट 8.95 रुपये प्रति लीटर, स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (एसएईडी) 6 रुपये, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (एईडी) 2 रुपये का शुल्क थी। बजट के बाद इस पर सेनवेट की दर प्रति लीटर घटा कर 5.46 रुपये कर दी गई। एसएईडी को तो 6 रुपये पर छोड़ दिया गया, लेकिन एईडी को बढ़ा कर 6 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया। पहले इन करों के ऊपर तीन फीसदी का शिक्षा उप कर लगता था, जो कि अब खत्म कर दिया गया है। कुल मिला कर देखें, तो पहले भी इस पर प्रति लीटर 17.46 रुपये का अप्रत्यक्ष कर था और अब भी यह 17.46 रुपये ही है।
इसी तरह अनब्रांडेड डीजल में पहले प्रति लीटर 7.96 रुपये का सेनवेट था, जिसे अब घटा कर 4.26 रुपये कर दिया गया है। इस पर एसएईडी पहले भी नहीं लगता था और अभी भी नहीं लगाया गया है। लेकिन अनब्रांडेड डीजल पर 2 रुपये प्रति लीटर का एईडी लगाया गया था, जिसे अब बढ़ा कर 6 रुपये प्रति लीटर हो गया है। डीजल पर लगने वाले अप्रत्यक्ष कर को देखें, तो यह पहले भी 10.26 रुपये प्रति लीटर था और अभी भी 10.26 रुपये प्रति लीटर ही है। इसमें भी पेट्रोल की तरह ही सेनवेट का हिस्सा घटा कर एईडी का हिस्सा बढ़ा दिया गया है।
उत्पाद एवं सीमा शुल्क विभाग के एक अधिकारी ने बताया किनए प्रावधान से उद्योग जगत को सेनवेट के रूप में कम रकम मिलेगी। उनके मुताबिक सेनवेट के मद में जो भी कर लिया जाता है, उसके बदले उद्यमी को सेनवेट क्रेडिट लेने की छूट होती है। जब साल का लेखा-जोखा बनता है तो सेनवेट के मद में जमा की गई राशि तो वापस मिल जाती है, लेकिन एक्साइज मद में जमा राशि नहीं मिलती है। अब सेनवेट घटा कर एक्साइज बढ़ाने से उद्यमियों को कम क्रेडिट मिलेगा।
मंझोले, लघु एवं सूक्ष्म उद्यमियों के संगठन फिस्मे के महासचिव अनिल भारद्वाज का कहना है कि इस प्रावधान से एमएसएमई की ईंधन की लागत बढ़ जाएगी। इससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर असर पड़ेगा। कुछ उद्यमियों को तो कीमत में भी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।

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नई दिल्ली।

करेंसी बाजार से लुप्त हो चुका एक रुपये का नोट नए साल से फिर आपके हाथों में होगा। केंद्र सरकार पहली जनवरी से इसकी छपाई फिर से शुरू करने की जा रही है। करीब 20 साल पहले एक रुपये का नोट छापना बंद कर दिया गया था।

एक दो व पांच रुपये के सिक्कों के प्रचलन में आने के बाद सरकार ने इनके नोटों की छपाई बंद कर दी थी। एक रुपये के नोट की छपाई नवंबर 1994 में, दो रुपये के नोट की छपाई फरवरी 1995 में और पांच रुपये के नोट की छपाई नवंबर 1995 में बंद हुई थी। हालांकि, पांच रुपये के नोट को सरकार ने फिर से छापना शुरू कर दिया था। अब सरकार ने एक रुपये के नोट की छपाई भी फिर से शुरू करने का निर्णय लिया है। वित्त मंत्रालय ने इसकी गजट अधिसूचना भी जारी कर दी है।

पहले की तरह इस बार भी एक रुपये के नोट की छपाई रिजर्व बैंक के बजाय भारत सरकार के मुद्रण कारखाने में होगी। नया नोट मौजूदा वित्त सचिव राजीव महर्षि के हस्ताक्षर से जारी होगा। नोट का आकार 9.7 गुणा 6.3 सेंटीमीटर का होगा और इसके शीर्ष पर भारत सरकार छपा होगा। नोट पर मल्टीटोनल वाटर मार्क में बिना सत्यमेव जयते शब्दों के अशोक की लाट अंकित होगी। मध्य भाग में सामान्य तौर पर न दिखने वाली संख्या ‘1’ प्रकाशित होगी। नोट के दाईं तरफ इसी प्रकार ‘भारत’ शब्द अंकित होगा।

अधिसूचना के मुताबिक, एक रुपये के करेंसी नोट का अगला हिस्सा गुलाबी और हरे रंग के मिश्रण में होगा। हिंदी व अंग्रेजी भाषा में वित्त सचिव के हस्ताक्षरों के साथ ‘भारत सरकार’ शब्द और रुपये के प्रतीक चिन्ह के साथ नए एक रुपये के सिक्के की प्रतिकृति होगी। नोट के निचले हिस्से में दाईं ओर नोट का नंबर होगा।

नोट के पिछले हिस्से में पुष्प डिजाइन वाले रुपये के प्रतीक चिन्ह के साथ एक रुपये के सिक्के के चित्र पर वर्ष 2015 के साथ अंग्रेजी में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया और हिंदी में भारत सरकार अंकित होगा। इसके चारों के डिजाइन में तेल खोज प्लेटफार्म सागर सम्राट का चित्र और 15 भारतीय भाषाओं में प्राधिकृत प्रतिदान घोषणा के साथ बीच में वर्ष संख्या अंकित होगी। इस हिस्से को कई अन्य रंगो के संयोजन से तैयार किया जाएगा।

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नई दिल्ली।

केंद्र सरकार ने डीजल और पेट्रोल की कीमतों में एक बार फिर से दो रुपये की कटौती करने का फैसला किया। यह कीमतें बीती आधी रात से लागू हो गईं। सरकार ने यह फैसला अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट के मद़देनजर किया है। गौरतलब है कि इससे पहले नवंबर में भी केंद्र सरकार डीजल और पेट्रोल के दामों में कमी कर चुकी है।

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मुंबई।

नारायण मूर्ति और नंदन नीलेकणि सहित इंफोसिस के चार संस्थापकों तथा उनके परिजनों ने सोमवार को इस आइटी कंपनी में एक अरब डॉलर (करीब 6,484 करोड़ रुपये) मूल्य के शेयर बेच डाले। यह चौंकाने वाला घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब सभी मूल प्रमोटर प्रबंधन से बाहर हो चुके हैं और कंपनी की बागडोर संस्थापकों के इतर किसी बाहरी के हाथ में दी गई है। अभी विशाल सिक्का कंपनी के सीईओ हैं।

संस्थापकों के इस फैसले के बाद इंफोसिस के शेयर तेजी से लुढ़क गए। बंबई शेयर बाजार में इस दिन कंपनी का शेयर 101.10 रुपये (4.88 फीसद) लुढ़ककर 1968.60 रुपये पर बंद हुआ। निवेशकों को इससे दो अरब डॉलर की चपत लगी। मूर्ति व नीलेकणि परिवार के अलावा पूर्व सीईओ और सह-संस्थापक शिबूलाल और के दिनेश ने भी शेयर बेचे हैं। इन चारों समेत सात इंजीनियरों ने 1981 में मात्र 250 डॉलर की पूंजी के साथ कंपनी की नींव रखी थी। गत तिमाही के अंत तक सभी साझेदारों की कंपनी में 15.92 फीसद की कुल हिस्सेदारी थी। वर्तमान में कंपनी का बाजार पूंजीकरण 2.25 लाख करोड़ रुपये है।

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मुंबई।

सेंसेक्स और निफ्टी की चाल बेहद सुस्त नजर आ रही है। आज सुबह बाजार खुलने के बाद बीएसई का 30 शेयरों वाला प्रमुख इंडेक्स सेंसेक्स कल के ही बंद स्तर यानि 28120 के आसपास नजर आ रहा है। जबकि एनएसई का 50 शेयरों वाला प्रमुख इंडेक्स निफ्टी 4 अंक गिरकर 8434 के स्तर पर कारोबार कर रहा है।

दसरी तरफ एफएमसीजी, कंज्यूमर ड्युरेबल्स, मेटल और कैपिटल गुड्स शेयरों में बिकवाली से बाजार पर दबाव बन रहा है। हालांकि फार्मा और आईटी शेयरों में खरीदारी का रुझान है। वहीं मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में मामूली खरीदारी देखने को मिल रही है। इसके अलावा कारोबार के दौरान डीएलएफ, कोटक महिंद्रा बैंक, ग्रासिम, बीएचईएल, अल्ट्राटेक सीमेंट, एनटीपीसी, ओएनजीसी, आईटीसी और हिंडाल्को जैसे दिग्गज शेयरों में 1.2-0.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि सन फार्मा, एमएंडएम, डॉ रेड्डीज, टीसीएस, बीपीसीएल और टाटा मोटर्स जैसे दिग्गज शेयरों में 2.2-0.6 फीसदी की मजबूती आई है।

मिडकैप शेयरों में सन फार्मा एडवांस्ड, एचएमटी, मैक्स इंडिया, जेट एयरवेज और केएसके एनर्जी सबसे ज्यादा 5.6-2.9 फीसदी तक उछले हैं। स्मॉलकैप शेयरों में ग्रैविटा इंडिया, सुदर्शन केमिकल, शेरॉन बायो, ऑनमोबाइल ग्लोबल और पॉलि मेडिक्योर सबसे ज्यादा 8.9-4.4 फीसदी तक चढ़े हैं।

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नई दिल्ली।

निवेशकों से फंड जुटाकर 78 कंपनियां चंपत हो चुकी हैं। इन्होंने निवेशकों से 310 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाया है। ऐसी फर्मो की सबसे बड़ी तादाद गुजरात में है। आधिकारिक आंकड़ों से इसका पता चलता है। लोगों को चूना लगाकर गायब हुईं कंपनियों पर कॉरपोरेट मामलों के मंत्रलय ने आंकड़े जुटाए हैं। इसके अनुसार ये कंपनियां गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में फैली हैं। ऐसी 78 भगोड़ा फर्मो में अकेले 17 फर्मे गुजरात में हैं।

सभी कंपनियों और उनके निदेशकों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर ली गई है। भारतीय दंड संहिता के तहत इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। शुक्रवार को संसद में भी इस बाबत जानकारी दी गई। एक अप्रैल से ऐसी कंपनियों को गठित करने के नियम लागू हुए। नए नियम अकेले व्यक्ति को कंपनी खोलने की इजाजत देते हैं। कंपनी अधिनियम में इस बाबत प्रावधान जोड़ा गया है। पुराने कानून के मुताबिक किसी कंपनी की स्थापना में दो लोगों का होना जरूरी था।

31 अक्टूबर तक कुल 911 ओपीसी पंजीकृत हुईं। इनकी सामूहिक अधिकृत पूंजी 19.86 करोड़ रुपये है। अप्रैल-अक्टूबर के दौरान सबसे ज्यादा 526 ओपीसी व्यापार सेवा क्षेत्र में पंजीकृत हुईं। ओपीसी के तहत उद्यमियों को फंड जुटाने में आसानी होगी।

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