Saturday, December 15, 2018
उत्तर प्रदेश

Varun Gandhi creating problem for BJP in up election

 

Lucknow.

बीजेपी को यूपी की जंग जिताने के लिए मोदी-शाह की जोड़ी ने जहां पूरा जोर लगा रखा है वहीं बीजेपी के अपने ‘गांधी’ हानिकारक साबित होते दिख रहे हैं. हम बात कर रहे हैं वरुण गांधी की. चुनाव प्रचार के दौरान वे यूपी में मौन रहे लेकिन चौथे चरण के मतदान के ठीक पहले इंदौर में वरुण गांधी कांग्रेस नेता के कार्यक्रम में शामिल हुए. वहां वरुण ने बयानों के ऐसे तीर छोड़े जो बीजेपी और मोदी सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती है. यूपी के चुनावी समर में राहुल और अखिलेश के बाद वरुण का नंबर तीसरे पायदान पर आता है और इस वजह से कुछ लोग इन्हें यूपी का तीसरा लड़का भी कहते हैं. आखिर क्या है वरुण की पार्टी में नाराजगी की वजह?
चुप्पी तोड़ी, मोदी सरकार की दुखती रग पर रखा हाथ
पीलीभीत के सांसद और बीजेपी के युवा नेता वरुण गांधी ने अपनी लंबी चुप्पी तोड़ दी है. वो मंगलवार को इंदौर के एक स्कूल में ‘विचार नए भारत का’ का विषय पर बोलने के लिए पहुंचे थे. इस विषय पर बोलते हुए वरुण गांधी ने हर उस विषय पर अपनी बात रखी जिसपर अबतक केंद्र की मोदी सरकार विपक्षी पार्टियों से घिरती रही है. वरुण गांधी ने हैदराबाद के दलित पीएचडी छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या, अल्पसंख्यकों की बढ़ती मुश्किलें, किसानों की आत्महत्या और विजय माल्या का विदेश भाग जाना सहित बढ़ती जीडीपी की हकीकत के बारे में भी अपनी बात रखी. ऐसा माना जा रहा है कि ये सारे के सारे वो मुद्दे हैं जिनपर केंद्र की बेजेपी सरकार घिरती रही है. राजनीतिक पंडितों की मानें तो वरूण अपने बयान से यूपी में बीजेपी लिए मुश्किलों की दीवार खड़ी कर रहे हैं.

‘वरुण गांधी स्वतंत्र विचार रखते है, RSS का बैकग्राउंड नहीं’
जानकार ऐसा कहते हैं कि वरुण गांधी का आरएसएस से कोई जुड़ाव नहीं है. वो मुद्दों पर स्वतंत्र राय भी रखते हैं. पार्टी की कमान जब राजनाथ सिंह के हाथों में थी तो वरुण की स्थिति पार्टी में अच्छी थी. लेकिन जैसे ही पार्टी की कमान अमित शाह के हाथों में गई वरुण गांधी को पार्टी से किनारा किया जाने लगा. कुछ महीनों पहले एक न्यूज वेबसाइट से बात करते हुए राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे ने कहा था, ’वरुण गांधी की संघ की पृष्ठभूमि नहीं है. वह स्वतंत्र रूप से सोचने वाले व्यक्ति हैं. मोदी और शाह की बीजेपी उत्तर प्रदेश में किसी मज़बूत नेतृत्व को विकसित नहीं करना चाहती है.’
खुद को पार्टी में किनारा किए जाने से हैं दुखी
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और अमित शाह के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद से ही वरुण गांधी को पार्टी में किनारा किया जाने लगा. 2014 में बीजेपी ने वरुण को राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटा दिया था. 12 जून 2016 को इलाहाबाद में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान वरुण ने पार्टी नेताओं के सामने शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की जो अमित शाह और मोदी को रास नहीं आई. पार्टी ने इस विधानसभा चुनाव में बड़ी संख्या में उन लोगों के टिकट काटे जो किसी न किसी तरह से वरुण गांधी के करीबी थे. पार्टी ने उन्हें स्टार प्रचारकों के अपने पहले लिस्ट में शामिल नहीं किया. दूसरे लिस्ट में वरुण का नाम सामने आया. इसे भी नाराजगी की वजह माना जा रहा है. कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि वरुण बहुत पहले से पार्टी छोड़ने का मन बना चुके हैं. ऐसे में वरुण गांधी यूपी चुनाव के दौरान हर वो काम कर सकते हैं जिससे पार्टी कमजोर हो.
बीजेपी भी वरुण को नहीं मानती अपना
जैसे ही पार्टी की कमान राजनाथ सिंह से अमित शाह के पास आई वैसे ही पार्टी में वरुण गांधी की स्थिति बदलने लगी. पार्टी में उनका कद घटने लगा. राजनीति की समझ रखने वाले बताते हैं कि वरुण के साथ ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि उनके नाम में ‘गांधी’ लगा है. अमित शाह और नरेंद्र मोदी इस नाम के साथ सहज नहीं है. वरुण गांधी भी इस बात को जानते हैं. जब नरेंद्र मोदी केंद्र में जीतकर आए और पार्टी अमित शाह के हाथ में गई तभी वरुण को लगने लगा था कि उनकी अहमियत पार्टी में कम हो जाएगी. बीजेपी वरुण गांधी को ‘गांधी परिवार’ का ही एक हिस्सा मानते हैं. इसका एक और सबूत है- सात जनवरी को बीजेपी के फेसबुक अकाउंट से एक वीडियो अपलोड हुआ. इस वीडियो में यह बताया गया कि नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं फिर भी उनके भाई, चाचा या दूसरे संबंधी गरीबी में रह रहे हैं या कोई छोटा-मोटा काम करके अपना जीवन चला रहे हैं लेकिन दूसरी तरह ऐसे परिवार हैं जिनका हर सदस्य सत्ता की मलाई खा रहा है. इस वीडियो में एक ग्राफिक्स के जरिए गांधी परिवार की वंशावली दिखाई गई और वरुण गांधी को उसी परिवार का सदस्य बताया गया.
अपने इलाके में प्रभावी हैं वरुण
यूपी के इस चुनाव में 45 उम्मीदवारों के टिकट इस वजह से कटे हैं कि वो वरुण के करीबी हैं. ये सारे के सारे उम्मीदवार निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं. जाहिर है कि इससे पार्टी को नुकसान होगा. ये सारे के सारे बीजेपी के विधायक हैं. इन उम्मीदवारों को चुनाव जीतवाने के लिए वरुण पूरी कोशिश कर रहे हैं. यह भी माना जाता है कि वरुण गांधी इन इलाकों में खासे प्रभावी हैं.

Samajwadi Party leader Gayatri Prajapati should be booked for gangrape: Supreme Court to UP police

नई दिल्ली।

अमेठी विधानसभा से सपा उम्मीदवार और मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला की ओर दुष्कर्म की शिकायत पर प्रदेश सरकार को एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस संबंध में आठ सप्ताह में स्टेटस रिपोर्ट भी मांगी है। अमेठी में 27 फरवरी को मतदान होना है।

न्यायमूर्ति एके सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश दिए। इससे पहले महिला की ओर से पेश वकील महमूद प्राचा ने आरोप लगाया कि उनकी मुवक्किल के साथ प्रजापति और उनके साथियों ने कई बार दुष्कर्म किया। उसकी बेटी के साथ भी छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न हुआ। प्रदेश के डीजीपी तक से शिकायत होने के बावजूद पुलिस ने एफआइआर दर्ज नहीं की।

प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील रवि प्रकाश मेहरोत्र ने कहा कि पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच की गई। इस जांच की सारी रिपोर्ट हलफनामे के साथ दाखिल की गई है। मामला तीन साल पुराना है। देरी से शिकायत करने का कारण शिकायतकर्ता नहीं बता पाई। ये मामला चुनाव के दौरान राजनीति से प्रेरित लगता है।

वर्तमान में दिल्ली में रह रही महिला ने प्रजापति और उनके साथियों पर 2013 और 2016 में सामूहिक दुष्कर्म और बेटी से यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा भी मांगी है। कोर्ट ने गत 25 नवंबर को नोटिस जारी किया था और याचिकाकर्ता को सुरक्षा देने का भी आदेश दिया था।

Sarojninagar constituency of Lucknow is important for all political parties

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरोजनीनगर के चुनावी दंगल में कई बड़ों की साख दांव पर लगी है। सपा के टिकट पर उतरे अनुराग यादव की वजह से अब इस सीट से सीएम की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। वहीं, दूसरी तरफ स्वाति सिंह की वजह से बीजेपी मुखिया अमित शाह का भरोसा भी दांव पर है। बसपा के टिकट पर दोबारा चुनाव मैदान में उतरे शिव शंकर उर्फ शंकरी सिंह के सामने पिछले चुनाव में मिली हार को जीत में बदलने की चुनौती है।

वहीं पिछले चुनाव में करीब 41 हजार वोट हासिल करने वाले निर्दलीय रुद्रदमन सिंह बब्लू भी बीजेपी से बगावत कर चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं। उनके पास अब खुद को साबित करने का मौका है। फिलहाल इन चारों उम्मीदारों के मजबूती से चुनाव में उतरने से सरोजनी नगर का चुनाव काफी रोचक हो गया है। यहां कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है।

सरोजनीनगर विधान सभा सीट पर चुनावी मुकाबला काफी रोचक होने जा रहा है। इस सीट पर प्रत्याशियों के साथ उनके आकाओं की प्रतिष्ठा भी जुड गयी है। अनुराग सांसद धर्मेन्द्र यादव के बड़े भाई हैं। अनुराग पूरी ताकत से मैदान में अड़े हैं। बीजेपी के टिकट पर उतरीं स्वाती सिंह का पूरा राजनीतिक करियर करीब छह महीने का है। उनके पति दयाशंकर सिंह भाजपा से जुड़े रहे हैं। स्वाति सिंह पहली बार जनता के सामने आयीं। उनके कड़े तेवर, सधी व सीधी बात ने उन्हें बीजेपी का नेता बना दिया।

अब वह सरोजनी नगर से मजबूती से चुनाव लड़ रही हैं। बसपा के टिकट पर यहां चुनाव लड़ रहे शिव शंकर सिंह उर्फ शंकरी सिंह 2012 के चुनाव में अपनी दमदारी दिखा चुके हैं। पिछले चुनाव में उन्हें अचानक मैदान में उतारा गया था लेकिन इस बार वह पांच वर्षों से क्षेत्र में डटे हुए हैं। इस सीट पर उनके खुद के साथ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भी साख जुड़ी है। उन्हें चुनाव में किसी से कम नहीं आंका जा रहा है। निर्दलीय चुनाव में उतरे रुद्र दमन सिंह बब्लू इस बार बीजेपी से टिकट मांग रहे थे।

चुनाव से पहले बीजेपी में भी शामिल हो गए थे। पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो बगावत कर फिर निर्दलीय मैदान में उतर गए। वर्ष 2012 का चुनाव भी उन्होंने निर्दलीय लड़ा था। उस चुनाव में उन्हें करीब 41386 वोट मिले थे। फिलहाल इस सीट पर चारों प्रत्याशी बड़ी मजबूती से मैदान में डटे हैं। इसीलिए यहां का चुनाव रोचक मोड़ पर पहुंच गया है। पहले सपा के टिकट से क्षेत्र से विधायक रहे शारदा प्रताप शुक्ला यहां से रालोद से मैदान में हैं।

BJP Change his Master Plan in UP Election after First Phase News in Hindi

लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वर्ष 2014 में ही यूपी के राजनीतिक महत्व का पता चल गया था। उन्हें विधानसभा चुनावों की अहमियत भी मालूम है। लिहाजा मोदी की टीम कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। चुनाव प्रचार से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक हर अभियान हाईटेक तरीके से चल रहा है। भाजपा के रणनीतिकार हरचंद कोशिश में हैं कि मतदान के हर चरण में विरोधियों को शिकस्त दी जाए। इसलिए भाजपा के फ्रंटल संगठनों से लेकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की समस्त अनुषांगिक इकाइयां चुनावी समर में आरपार की लड़ाई लड़ रही हैं।

मोदी की जरूरत है यूपी

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी की जनता ने मोदी की मन मांगी मुराद पूरी कर दी थी। विधानसभा चुनावों में भी मोदी की मुराद कुलाचे मार रही है। उन्हें पता है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर ही जाता है। इसलिए यूपी में भाजपा का सत्ता से वनवास तोड़ना बेहद जरूरी है। इसलिए मोदी की नजर 403 विधानसभा वाली यूपी पर है। हालांकि राजनीतिक प्रेक्षक इस चुनावों को अभी से 2019 के आम चुनाव के पहले लोगों में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के प्रति लगाव के टेस्ट के रूप में भी देखा जा रहा है। चुनाव से पहले ही सभी दल अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं और साथ ही गठबंधनों से बने नए समीकरणों पर जीत हार तय होने की भी चर्चा है। सर्वाधिक जनसंख्या वाला राज्य और वोटरों की संख्या भी इस राज्य में सबसे ज्यादा है। यूपी की राजनीति में भाजपा काफी लंबे समय से सत्ता से बाहर है। भाजपा इससे उबरने के लिए इस बार भी मोदी लहर के सहारे है। 2014 के आम चुनाव में पार्टी को मोदी लहर का ऐसा फायदा मिला था कि राज्य की 80 लोकसभा में से पार्टी को 71 सीटों पर कामयाबी मिली थी।

मौका नहीं छोड़ना चाहते मोदी

दरअसल भाजपा के लिए यूपी का चुनाव जीतना प्रतिष्ठा की जंग बन गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई भी अवसर हाथ से नहीं गवाना चाहते। पार्टी के भगवाधारी नेता हिंदू कार्ड चलाने से नहीं चूक रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से पहले विवादास्पद राममंदिर के मुद्दे को को एक बार फिर से उठाया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि अगर भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनती है तो अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा। 1992 से 2000 तक राम भाजपा की राजनीति के केंद्र में रहे हैं।

पिछड़े वाटों पर है मोदी की नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछड़ों-अतिपिछड़ों को भाजपा से जोड़ने की चुनाव पूर्व मुहिम चलाई। राजनीति के जानकारों का कहना है कि वोट बैंक की दृष्टि से प्रदेश में अतिपिछड़ी जातियों का सबसे बड़ा वोट बैंक है। शायद यही कारण है कि 43 फीसदी से अधिक गैर यादव पिछड़ों में कुर्मी, लोधी, जाट, गूजर, सोनार, गोसाई, कलवार, अरक आदि की 10.22 फीसदी और मल्लाह, केवट, कुम्हार, गड़ेरिया, काछी, कोयरी, सैनी, राजभर, चौहान, नाई, भुर्जी, तेली आदि 33.34 फीसदी संख्या वाली अत्यंत पिछड़ी हिस्सेदारी वाले इस वोट बैंक पर मोदी की नजर है। समाजवादी पार्टी ने जहां 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के मुद्दे को तूल देने का काम किया है तो बसपा अतिपिछड़ों को काडर कैंप के जरिए अपने पाले में करने की कोशिश में है।

भाजपा ने उछाला अतिपिछड़ों को विशेष आरक्षण का मुद्दा

यूपी की सत्ता पर काबिज होने की खातिर ही भाजपा ने अति पिछड़ों को 7.5 फीसदी विशेष आरक्षण कोटा देने व सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट लागू करने का मुद्दा उछालने का काम किया है। उत्तर प्रदेश में सत्ता में वापसी का भरोसा जताते हुए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि उनकी पार्टी अकेले ही राज्य में अगली सरकार बनाएगी क्योंकि सपा-कांग्रेस गठबंधन को करारी शिकस्त मिलेगी। वह अखिलेश-राहुल के गठबंधन पर कहते हैं कि अगर सपा चुनाव जीतने को लेकर निश्चिंत होती तो वह कांग्रेस के साथ गठबंधन क्यों हाथ मिलाती। सपा ने गठबंधन इसलिए किया क्योंकि चुनाव में इसके नेताओं की हार प्रत्याशित थी।

First phase of Uttar Pradesh assembly elections Live Update News in Hindi

नोएडा. यूपी विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए आज सुबह सात बजे से मतदान शुरू हो गया है। बता दें कि पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 15 जिलों की 73 विधानसभा सीटों पर सुबह से ही मतदाताओं की कतारें लगनी शुरू हो गई हैं।
शांतिपूर्ण मतदान के लिए प्रशासन भी पूरी तहर मतदान केंद्रों पर मुस्‍तैद है। साथ ही कई संवेदनशील बूथों पर वीडियोग्राफी भी कराई जा रही है। यहां बता दें कि आज शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, बुलंदशहर सहित 15 जिलों के दिग्‍गजों किस्‍मत आज दांव पर है। जिसमें राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह, बीजेपी के फायरब्रांड नेता संगीत सोम, सपा के कद्दावर नेता अतुल प्रधान और सपा के कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर की साख दांव पर लगी हुई है। अब देखने वाली बात ये होगी कि आखिर किस्मत चमकेगी और किसकी नहीं।

इस चरण में चरण में अगर सबसे बड़े नाम की करें तो वो और कोई नहीं गौतमबुद्ध नगर जिले के नोएडा विधानसभा सीट पर पहली बार चुनाव लड़ रहे देश के गृह मंत्री के बेटे पंकज सिंह हैं। इस लिहाज से नोएडा की सीट गृह मंत्री के लिए भी साख का सवाल है। भाजपा के पंकज सिंह का मुकाबला सपा के सुनील चौधरी और बसपा के रविकांत मिश्रा के साथ है। आपको बता दें कि नोएडा विधानसभा सीट भाजपा की सेफ सीटों में मानी जाती है। जिसके तहत उनके जीतने के आसार दिखाई दे रहे हैं।

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष

भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी पश्चिमी यूपी की महत्वपूर्ण सीटों में से एक मेरठ से चुनाव मैदान में है। मेरठ में पहले चरण में ही चुनाव होगा। लक्ष्मीकांत वाजपेई यूपी के राजनीतिक गलियारों में बड़ा नाम माना जाता है। उन्हीं के नेतृत्व में प्रदेश में भाजपा ने 73 लोकसभा सीटें जीती थी। इस बार उनके सामने बड़ी चुनौती होगी। खासकर मुस्लिम बाहुल्य इलाके में सिर्फ एक ही मुस्लिम कैंडीडेट है। वहीं दो कैंडीडेट हिंदू खड़े हो गए हैं।

इन दो फायरब्रांड नेताओं में होगी टक्कर

मेरठ की सरधना सीट मौजूदा समय की सबसे हॉट सीट हो गई है। ताज्जुब की बात तो ये है कि इस सीट पर बड़ी पार्टियों के तीन बड़े कैंडीडेट हैं। पहला नाम भाजपा के संगीत सोम है। जिनके समर्थकों की संख्या काफी अधिक है। साथ ही यूपी की राजनीति में बड़ा नाम है। वहीं दूसरा नाम सपा के अतुल प्रधान है। वेस्ट यूपी ही नहीं बल्कि पूरे यूपी के युवाओं में वो काफी लोकप्रिय है। उन्होंने काफी कम समय में ये लोकप्रियता हासिल की है। वहीं तीसरा नाम बसपा ने मोहम्मद इमरान का है। इमरान वैसे तो पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन वह प्रदेश के पूर्व मंत्री और बसपा के बड़े नेता हाजी याकूब के बेटे हैं। उन्हें किसी भी तरह से नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है।

सांसद की बेटी भी मैदान में

पलायन का मुद्दा उठाने वाले और कैराना से भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को कैराना से टिकट मिला है। लेकिन इसके विरोध में हुकुम सिंह के भतीजे को राष्ट्रीय लोकदल से टिकट मिला है। इस सीट पर सांसद हुकुम सिंह और उनकी बेटी की साख भी दाव पर लगी हुई है। पार्टी और सांसद की ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।

ये भी हैं बड़े नाम

वहीं दूसरी ओर थानाभवन विधानसभा सीट से भाजपा नेता सुरेश राणा भी मैदान में हैं। इन्हें मुजफ्फरनगर दंगों का आरोपी बताया गया था। वहीं दूसरी ओर गढ़मुक्तेश्वर विधानसभा सीट से मदन चौहान भी चुनावी मैदान में दिखाई देंगे। उनकी किस्तम का फैसला भी 11 फरवरी को होना है। उन्हें भी वेस्ट यूपी का नहीं बल्कि पूरे यूपी का बड़ा नेता माना जाता है। मंत्री पद भी रह चुके हैं।

लखनऊ। अपनी कार्यप्रणाली से चर्चा में रहने वाले वाला एलडीए एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बार एलडीए के बाबुओं ने आठ हजार के मकान पर बारह लाख रुपये का ब्याज लगा दिया है। अब आवंटी एलडीए के चक्कर लगा रहा है। जी हां एलडीए में कोई काम इतनी आसानी से नहीं होता, यहां पिता द्वारा खरीदे गए मकान का फ्री होल्ड या तो बेटा करा पाता है या फिर पोता। हां अगर बाबू चाह जाए तो यह काम मिनटों में हो जाता है। ऐसी बानगी यहां आए दिन देखी जा सकती हैं।

केस एक : वर्ष 1982 में आठ हजार में खरीदे गए मकान की कीमत 34 साल बाद 12 लाख रुपये हो गई। यह हाल तब है जब आवंटी ने छह हजार रुपये दो दशक पहले ही जमा कर दिए थे। अब आवंटी गुरविंदर कौर अपने बेटे के साथ एलडीए के चक्कर लगाने को विवश हैं। हालांकि वर्तमान में आवंटी अपने मकान में रह रहा है। गुरुविंदर कौर कहती हैं कि वर्ष 1982 में मोतीझील में एक कमरे का मकान आवंटित कराया था। उस दौरान एलडीए की किस्त 64 रुपये हुआ करती थी। करीब छह हजार रुपये जमा कर दिए थे। दो हजार जब बाकी रह गए तो संबंधित बाबू से रजिस्ट्री के लिए कहा, लेकिन बाबू ने फाइल खो जानी की बात कह दी थी। आवंटी को उम्मीद है कि कुछ अफसरों की मदद से उनका काम हो जाएगा।

केस दो : अरविंद कुमार दुबे ने एलडीए योजना के अंतर्गत कानपुर रोड पर 1997 में 2152 स्क्वायर फीट का प्लाट बुक कराया था। वर्ष 2002 तक किस्त देने के बाद जब एलडीए से रजिस्ट्री की बात कही तो बताया गया कि आप का प्लॉट ही नक्शे में नहीं है यानी मिस हो गया है। दुबे ने कई अफसरों से गुहार लगाई, लेकिन अपनी आदतों से मजबूर बाबू व अधिकारी कुछ न कर सके। दुबे ने लोकायुक्त का जब दरवाजा खटखटाया तो लोकायुक्त ने उपाध्यक्ष को तलब कर लिया। तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष ने लोकायुक्त की फटकार से बचने के लिए तालाब पर ही प्लाट कटवाकर रजिस्ट्री करवा दी और प्लाट नंबर ए 1 223 बता दिया लेकिन कब्जा आज तक नहीं मिला।

यह दो मामले सिर्फ बानगी हैं। ऐसे कई मामले एलडीए में आए दिन देखे जा सकते हैं। योजना देख रहे बाबुओं की मर्जी के बिना लखनऊ विकास प्राधिकरण में पत्ता तक नहीं हिलता। एलडीए के वरिष्ठ अधिकारी भी इसके आगे बेबस हैं।

CBI will attaches babu singh Kushwaha properties in NRHM scam

गाजियाबाद । एनआरएचएम घोटाले में सीबीआइ की विशेष कोर्ट के जज पवन कुमार तिवारी ने तीन मामलों में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा, पूर्व महानिदेशक परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य डॉ. चंद्रभान प्रसाद एवं संयुक्त निदेशक लेप्रोसी डॉ. पवन कुमार श्रीवास्तव के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

अदालत 20 मार्च को सुनवाई करेगी। सीबीआइ के वरिष्ठ लोक अभियोजक बीके सिंह एवं अनुराग मोदी ने अदालत को बताया कि एक मामले में बाबू सिंह के खिलाफ नौ जनवरी को गैर जमानती वारंट जारी किया गया था, इसके बावजूद वह पेश नहीं हुए, इससे कोर्ट की कार्रवाई प्रभावित हो रही है। अदालत ने सीबीआइ को कुर्की की कार्रवाई का आदेश दिया। कोर्ट पहले भी कई मामलों में बाबू सिंह के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई का आदेश दे चुकी है।

दूसरे मामले में डा चंद्रभान प्रसाद के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई का आदेश दिया गया। उन पर आरोप है कि 31 मार्च 2010 को पुराने टेंडर पर ही महानिदेशालय के सांख्यिकी सहायक तुलसीराम तिवारी के साथ मिलकर आरके ट्रेडर्स के संचालक राकेश सिंह द्वारा स्वास्थ्य संबंधित डिस्प्ले बोर्ड, पोस्टर एवं बैनर बनाकर प्रदेश की सरकारी अस्पतालों में आपूर्ति कराई गई। इससे सरकारी विभाग को लगभग 92.83 लाख रुपये नुकसान हुआ।

तीसरे मामले में लेप्रोसी के संयुक्त निदेशक डा. पवन कुमार श्रीवास्तव ने लगभग 57 लाख रुपये के फ्लैक्सी एवं बोर्ड की आपूर्ति नियमों के विरुद्ध की। यह भी लंबे समय से कोर्ट में पेश नहीं हो रहे हैं। अदालत ने नौ जनवरी को उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था इसके बावजूद वह पेश नहीं हुए थे।

लखनऊ.
यूपी विधानसभा चुनाव 2017 को लेकर कांग्रेस ने बुधवार को अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपी चुनाव प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने घोषणा पत्र के मुख्य बिंदुओं को बताते हुए कहा कि अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन की सरकासर यूपी में आती है तो किसानों के जीवन को बेहतर बनाने का काम किया जाएगा। इसके साथ ही पंचायत में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता जैसे अशोक गहलोत, सलमान खुर्शीद निर्मल खत्री और प्रमोद तिवारी मौके पर मौजूद रहे।
घोषणा पत्र के मुख्य बिंदु…
हर जिले में महिला थाने का गठन करेंगे
लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करेंगे
महिला सशक्तिकरण पर फोकस
हर वर्ग को मिलेगा बराबरी का हक
किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा
जेलों में सुधार किया जाएगा
रोजगार को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री कार्यालय के अधीन एक अलग प्रकोष्ठ बनाया जाएगा
बिजली दर को सस्‍ता करने का काम किया जाएगा
अल्‍पसंख्यकों के कल्‍याण पर फोकस किया जाएगा

Bjp will take action against leaders who object party decisions

लखनऊ।

“जबरा मारे रोने न दे” ये मुहावरा भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के नीति निर्धारकों पर समयानुसार सटीक बैठ रहा है।प्रत्याशी चयन में जिम्मेदार लोगों पर धन उगाही जैसे गंभीर आरोपों पर चुप्पी साध लिया नेतृत्व मौका पाते ही अनुशासन की आड़ में बदले की कार्यवाही की रूप -रेखा तैयार कर लिया है।

पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी ओम माथुर ने मीडिया के माध्यम से सन्देश भेजा है कि चुनाव में भीतरघात और चुप्पी साधे कार्यकर्ताओं पर उनकी नजर है। माना जा रहा है कि माथुर ने कार्यकर्ताओं को यह सन्देश देकर आक्रोश का तापमान मापने की कोशिश की है।साथ ही तमाम धांधली के आरोपों को दरकिनार कर चुनाव में पार्टी प्रत्याशियों के समर्थन में न निकलने वालों की लिस्ट बनाने की बात करके उपेक्षित किये गए कार्यकर्ताओं को दबाव में लेने की कोशिश की गयी है।

यदि ऐसा है तो नेताओं के अहंकारी रवैये से यूपी विधानसभा चुनाव परिणाम में भाजपा को लेने को देने पड़ सकते हैं। चुनावी रणनीति में पार्टी में महाबली बन कर उभरे प्रदेश महामंत्री संगठन सुनील बंसल द्धारा सार्वजानिक तौर से रूठों को समझाने का पार्टी अब तक कोई सकारात्मक प्रचार नहीं करती नहीं दिख पा रही हैं।

भाजपा मामलों के जानकर वरिष्ठ पत्रकार आरपी सिंह के अनुसार भाजपा नेतृत्व समायोजन का लालच देकर या हंटर दिखा कर यूपी के कार्यकर्ताओं को सक्रिया नहीं कर पायेगा। टिकट वितरण के समय कार्यकर्ताओं को अकड़ दिखाने वाले नेता यदि समय रहते आहत नेताओं से याचक बन कर संपर्क करेंगे तो पार्टी की स्थिति में गुणात्मक सुधार होगा नहीं तो फिर सरकार ढूंढते रह जायेंगे।

poster war between BJP and SP congress in UP Election 2017

लखनऊ. यूपी में विधानसभा चुनाव के लिए हर पार्टियां अपनी ताकत झोंके हुए हैं। हर कोई अपने विरोधियों को मात देने में लगा हुआ है। प्रचार भी हाईटेक हो गया है। सोशल मीडिया चुनाव प्रचार में एक अहम मंच देता है। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए यूपी चुनाव में बीजेपी समर्थकों की ओर से सपा के स्लोगन के जवाब में एक नया स्लोगन और पोस्टर जारी किया गया है।

यूपी को ये साथ पसंद है
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव की फोटो के साथ यूपी को ये साथ पसंद है, के नाम से पोस्टर और स्लोगन जारी किया गया था, जिसके जरिए मतदाताओं को ये संदेश देने की कोशिश की गई थी कि लोगों को अखिलेश और राहुल का साथ पसंद है। इसकी चर्चा सपा की जनसभाओं में भी खुब होता है।

यूपी को ये 7 पसंद है
वहीं बीजेपी ने भी इसका जवाब अब निकाल लिया है। सोशल मीडिया में पिछले एक नया पोस्टर वायरल होने लगा है और नारा है यूपी को ये 7 पसंद है। बीजेपी समर्थकों ने इस पोस्टर को राहुल और अखिलेश के जबाब में निकाला है जिसमें पीएम मोदी के साथ सात नेताओं की तस्वीरें लगी हैं और नारे के तौर पर लिखा है यूपी को ये 7 पसंद है। यह बीजेपी की ओर से सपा को करारा जवाब है। कांग्रेस के गठबंधन के बाद राहुल गांधी और अखिलेश यादव की फोटो के साथ यूपी को ये साथ पसंद है्य के नाम से पोस्टर और स्लोगन जारी किया गया था। इसको सपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों ने काफी प्रमुखा भी दिया। समर्थकों ने भी इसका खूब प्रचार और प्रसार किया है।

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