मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी ने बढ़ाई प्रत्याशियों की धड़कनें

मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी ने बढ़ाई प्रत्याशियों की धड़कनें

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All parties pin hopes of capturing power in Uttar Pradesh on the support of Muslim voters

बाराबंकी। मतदान का समय नजदीक आता जा रहा है और साथ ही विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। 19 फरवरी को होने वाले तीसरे चरण के मतदान पर सभी की निगाहें टिकी हुई। आखिर इस बार के चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का रुझान किस ओर होगा। चुनाव में सबसे अधिक निर्णायक वोटरों में शामिल मुस्लिम मतदाताओं की खामोशी ने सभी राजनीतिक दलों के दिल की धड़कनें बढ़ा दी हैं।

जिस तरह चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों के प्रत्याशी सबकी समस्याओं का समाधान करवाने और क्षेत्र को स्वर्ग बनाने के सपने दिखाकर वोट मांग रहे है। ठीक उसी तरह मतदाता भी सभी प्रत्याशियों का समर्थन करने का आश्वासन देते नजर आ रहे हैं। लेकिन अब तक मतदाताओं का रुझान किस ओर है, इस बात की जानकारी नहीं मिल पा रही है। सबसे खास बात यह है कि मुस्लिम मतदाताओं का रुझान भी पता नहीं चल पा रहा है। जबकि सबको अच्छी तरह मालूम है कि जनपद की छह विधानसभाओं में से पांच विधानसभाओं में मुस्लिम मतदाता सर्वाधिक है।

उनका समर्थन जिस किसी भी पार्टी को मिलेगा, उसके प्रत्याशी का जीतना तय है। बाराबंकी जनपद की हैदरगढ़ विधानसभा को छोड़कर बाकी अन्य पांच विधानसभा कुर्सी, सदर, जैदपुर रामनगर और दरियाबाद की सीटों पर मुस्लिम वोट सत्ता का खेल बनाने-बिगाड़ने में हर बार अहम भूमिका निभाते हैं। जबकि इस बार के विधानसभा चुनाव में अब तक मुस्लिमों का रुख पूरी तरह साफ नहीं है। इस बार के चुनाव में कहीं सपा-कांग्रेस गंठबंधन तो कहीं बसपा उनकी पसंद बनती दिख रही है।

वहीं कुछ सीटों पर पीस पार्टी और अन्य मुस्लिम समर्थित पार्टी भी मुस्लिम वोटों की दावेदारी में लगा हुआ है। इन सभी विधानसभा सीटों पर उनके वोटों का बंटवारा हो या एकजुटता दिखे, दोनों ही स्थिति में चुनावी नतीजे प्रभावित होना तय है। हालांकि भाजपा इन सीटों में हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की आस संजोए बैठी है। तो वहीं सपा, कांग्रेस-बसपा के अलावा अन्य राजनीतिक दल अपने परंपरागत वोटों के साथ ही मुस्लिम मतों को सहेजने में जुटी हुई है। हालांकि कुछ जगहों पर मुस्लिमों का रुझान साफ है, लेकिन मतदान की तारीख नजदीक आ जाने के बावजूद भी ज्यादातर सीटों पर मुलिम मतदाताओं ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

गौरतलब है कि मुस्लिमों की सियासत में सक्रिय नेता भी उनके वोट के सवाल पर बंटे हुए हैं। हर व्यक्ति अलग-अलग नजरिये से मुस्लिमों के लाभ और नुकसान का आंकड़ा मालूम करने में जुटा हुआ है। इसलिए उनकी तरफ से भी मतदाताओं की उलझनों को सुलझाने का कोई निर्णायक जवाब नहीं मिल पा रहा है। नतीजतन अभी भी मुस्लिम मतदाता किस पार्टी को वोट देंगे, इसको लेकर वोटर किसी निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचे हैं।