मोदी ने आज एक बार फिर लोगों से मन की बात की

मोदी ने आज एक बार फिर लोगों से मन की बात की

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक बार फिर लोगों से मन की बात की। मोदी ने कहा कि मुझे जनशक्ति पर अपार विश्वास है। मैं करीब एक साल से आपसे मन की बात कर रहा हूं। उन्होंने कहा कि लोगों के द्वारा भेजे जा रहे लाखों पत्र मुझे काफी खुशी देते हैं। पीएम ने कहा कि हमारा मंत्रालय लोगों के सुझावों को गंभीरता से लेता है और उनके पत्रों को पढ़कर काफी सीख लेते है। पढ़ें- पीएम ने क्या-क्या कहा-
मेरे प्यारे देशवासियों, आप सबको नमस्कार! च्मन की बातज् का ये बारहवां एपिसोड है और इस हिसाब से देखें तो एक साल बीत गया। पिछले वर्ष, 3 अक्टूबर को पहली बार मुझे च्मन की बातज् करने का सौभाग्य मिला था। च्मन की बातज् – एक वर्ष, अनेक बातें। मैं नहीं जानता हूं कि आपने क्या पाया, लेकिन मैं इतना ज़रूर कह सकता हूं, मैंने बहुत कुछ पाया।

लोकतंत्र में जन-शक्ति का अपार महत्व है। मेरे जीवन में एक मूलभूत सोच रही है और उसके कारण जन-शक्ति पर मेरा अपार विश्वास रहा है। लेकिन च्मन की बातज् ने मुझे जो सिखाया, जो समझाया, जो जाना, जो अनुभव किया, उससे मैं कह सकता हूं कि हम सोचते हैं, उससे भी ज्यादा जन-शक्ति अपरम्पार होती है। हमारे पूर्वज कहा करते थे कि जनता-जनार्दन, ये ईश्वर का ही अंश होता है। मैं च्मन की बातज् के मेरे अनुभवों से कह सकता हूं कि हमारे पूर्वजों की सोच में एक बहुत बड़ी शक्ति है, बहुत बड़ी सच्चाई है, क्योंकि मैंने ये अनुभव किया है। च्मन की बातज् के लिए मैं लोगों से सुझाव मांगता था और शायद हर बार दो या चार सुझावों को ही हाथ लगा पाता था, लेकिन लाखों की तादाद में लोग सक्रिय हो करके मुझे सुझाव देते रहते थे। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी शक्ति है, वर्ना प्रधानमंत्री को सन्देश दिया, mygov.inपर लिख दिया, चिठ्ठी भेज दी, लेकिन एक बार भी हमारा मौका नहीं मिला, तो कोई भी व्यक्ति निराश हो सकता है। लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगा।

हां… मुझे इन लाखों पत्रों ने एक बहुत बड़ा पाठ भी पढ़ाया। सरकार की अनेक बारीक कठिनाइयों के विषय में मुझे जानकारी मिलती रही और मैं आकाशवाणी का भी अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने इन सुझावों को सिर्फ एक कागज नहीं माना, एक जन-सामान्य की आकांक्षा माना। उन्होंने इसके बाद कार्यक्रम किये। सरकार के भिन्न-भिन्न विभागों को आकाशवाणी में बुलाया और जनता-जनार्दन ने जो बातें कही थीं, उनके सामने रखीं। कुछ बातों का निराकरण करवाने का प्रयास किया। सरकार के भी हमारे भिन्न-भिन्न विभागों ने, लोगों में इन पत्रों का एनालेसिस किया और वो कौन-सी बातें हैं कि जो पॉलिसी मैटर हैं? वो कौन-सी बातें हैं, हैं? वो कौन-सी बातें हैं, जो सरकार के ध्यान में ही नहीं हैं? बहुत सी बातें ग्रास रूट लेवल से सरकार के पास आने लगीं और ये बात सही है कि गवर्वनेंस का एक मूलभूत सिद्धांत है कि जानकारी नीचे से ऊपर की तरफ जानी चाहिए और मार्गदर्शन ऊपर से नीचे की तरफ जाना चाहिये। ये जानकारियों का स्रोत, च्मन की बातज् बन जाएगा, ये कहाँ सोचा था किसी ने? लेकिन ये हो गया।
और उसी प्रकार से च्मन की बातज् ने समाज- शक्ति की अभिव्यक्ति का एक अवसर बना दिया। मैंने एक दिन ऐसे ही कह दिया था कि सेल्फ़ी विद डॉटर और सारी दुनिया अचरज हो गई, शायद दुनिया के सभी देशों से किसी-न-किसी ने लाखों की तादाद में सेल्फ़ी विद डॉटरऔर बेटी को क्या गरिमा मिल गयी। और जब वो सेल्फ़ी विद डॉटर करता था, तब अपनी बेटी का तो हौसला बुलंद करता था, लेकिन अपने भीतर भी एक कमिटमेंट पैदा करता था। जब लोग देखते थे, उनको भी लगता था कि बेटियों के प्रति उदासीनता अब छोड़नी होगी।

भारत के टूरिज्म को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐसे ही नागरिकों को कहा था, इनक्रिडिबल इंडिया कि भई, आप भी तो जाते हो, जो कोई अच्छी तस्वीर हो, तो भेज देना, मैं देखूंगा। यूं ही हल्की-फुल्की बात की थी, लेकिन क्या बड़ा गजब हो गया! लाखों की तादाद में हिन्दुस्तान के हर कोने की ऐसी-ऐसी तस्वीरें लोगों ने भेजीं। शायद भारत सरकार के टूरिज्म ने, राज्य सरकार के टूरिज्म डिपार्टमेंट ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि हमारे पास ऐसी-ऐसी विरासतें हैं। एक प्लेटफॉर्म पर सब चीज़ें आईं और सरकार का एक रुपया भी खर्च नहीं हुआ। लोगों ने काम को बढ़ा दिया।

मुझे खुशी तो तब हुई कि पिछले अक्टूबर महीने के पहले मेरी जो पहली च्मन की बातज् थी, तो मैंने गांधी जयंती का उल्लेख किया था और लोगों को ऐसे ही मैंने प्रार्थना की थी कि २ अक्टूबर महात्मा गांधी की जयंती हम मना रहे हैं। एक समय था, खादी फॉर नेशन क्या समय का तकाज़ा नहीं है कि खादी फॉर फैशन और लोगों को मैंने आग्रह किया था कि आप खादी खरीदिये। थोडा बहुत कीजिये। आज मैं बड़े संतोष के साथ कहता हूं कि पिछले एक वर्ष में करीब-करीब खादी की बिक्री डबल हुई है। अब ये कोई सरकारी ऐड से नहीं हुआ है। अरबों-खरबों रूपए खर्च कर के नहीं हुआ है। जन-शक्ति का एक एहसास, एक अनुभूति।

एक बार मैंने च्मन की बातज् में कहा था, गरीब के घर में चूल्हा जलता है, बच्चे रोते रहते हैं, गरीब मां – क्या उसे गैस सिलेंडर नहीं मिलना चाहिए? और मैंने सम्पन्न लोगों से प्रार्थना की थी कि आप सब्सिडी नहीं छोड़ सकते क्या? सोचिये और मैं आज बड़े आनंद के साथ कहना चाहता हूं कि इस देश के तीस लाख परिवारों ने गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ दी है और ये अमीर लोग नहीं हैं। एक टीवी चैनल पर मैंने देखा था कि एक रिटायर टीचर, विधवा महिला, वो कतार में खड़ी थी सब्सिडी छोड़ने के लिए। समाज के सामान्य जन भी, मध्यम वर्ग, निम्न-मध्यम वर्ग जिनके लिए सब् छोड़ना मुश्किल काम है। लेकिन ऐसे लोगों ने छोड़ा।

सरकारों को भी सबक सीखना होगा कि हमारी सरकारी चौखट में जो काम होता है, उस चौखट के बाद एक बहुत बड़ी जन-शक्ति का एक सामर्थ्यवान, ऊर्जावान और संकल्पवान समाज है। सरकारें जितनी समाज से जुड़ करके चलती हैं, उतनी ज्यादा समाज में परिवर्तन के लिए एक अच्छी कैटालिटिस एजेंट के रूप में काम कर सकती हैं। च्मन की बातज् में, मुझे सब जिन चीज़ों में मेरा भरोसा था, लेकिन आज वो विश्वास में पलट गया, श्रद्धा में पलट गया और इसलिये मैं आज च्मन की बातज् के माध्यम से फिर एक बार जन-शक्ति को शत-शत वंदन करना चाहता हूं, नमन करना चाहता हूं। हर छोटी बात को अपनी बना ली और देश की भलाई के लिए अपने-आप को जोड़ने का प्रयास किया। इससे बड़ा संतोष क्या हो सकता है?

च्मन की बातज् में इस बार मैंने एक नया प्रयोग करने के लिए सोचा। मैंने देश के नागरिकों से प्रार्थना की थी कि आप फोन करके अपने सवाल, अपने सुझाव दर्ज करवाइए, मैं च्मन की बातज् में उस पर ध्यान दूंगा। मुझे ख़ुशी है कि देश में से करीब पचपन हज़ार से ज़्यादा फोन आये। चाहे सियाचिन हो, चाहे कच्छ हो या कामरूप हो, चाहे कश्मीर हो या कन्याकुमारी हो। हिन्दुस्तान का कोई भू-भाग ऐसा नहीं होगा, जहां से लोगों ने फोन न किये हों। ये अपने-आप में एक सुखद अनुभव है। सभी उम्र के लोगों ने सन्देश दिए हैं। कुछ तो संदेश मैंने खुद ने सुनना भी पसंद किया, मुझे अच्छा लगा। बाकियों पर मेरी टीम काम कर रही है। आपने भले एक मिनट-दो मिनट लगाये होंगे, लेकिन मेरे लिए आपका फोन, आपका संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। पूरी सरकार आपके सुझावों पर ज़रूर काम करेगी।

लेकिन एक बात मेरे लिए आश्चर्य की रही और आनंद की रही। वैसे ऐसा लगता है, जैसे चारों तरफ निगेटिविटी है, नकारात्मकता है। लेकिन मेरा अनुभव अलग रहा। इन पचपन हज़ार लोगों ने अपने तरीके से अपनी बात बतानी थी। बे-रोकटोक था, कुछ भी कह सकते थे, लेकिन मैं हैरान हूं, सारी बातें ऐसी ही थीं, जैसे च्मन की बातज् की छाया में हों। पूरी तरह सकारात्मक, सुझावात्मक, सृजनात्मक – यानि देखिये देश का सामान्य नागरिक भी सकारात्मक सोच ले करके चल रहा है, ये तो कितनी बड़ी पूंजी है देश की। शायद १त्न, २त्न ऐसे फ़ोन हो सकते हैं जिसमें कोई गंभीर प्रकार की शिकायत का माहौल हो। वर्ना 10त्न से भी ज़्यादा एक ऊर्जा भरने वाली, आनंद देने वाली बातें लोगों ने कही हैं।

एक बात और ध्यान में मेरे आई, ख़ास करके स्पेशली एबल्ड उसमें भी ख़ासकर के दृष्टिहीन अपने स्वजन, उनके काफी फ़ोन आये हैं। लेकिन उसका कारण ये होगा, शायद ये टीवी देख नहीं पाते, ये रेडियो जरूर सुनते होंगे। दृष्टिहीन लोगों के लिए रेडियो कितना बड़ा महत्वपूर्ण होगा, वो मुझे इस बात से ध्यान में आया है। एक नया पहलू मैं देख रहा हूं, और इतनी अच्छी-अच्छी बातें बताई हैं इन लोगों ने और सरकार को भी संवेदनशील बनाने के लिए काफी है।

मुझे अलवर, राजस्थान से पवन आचार्य ने एक सन्देश दिया है, मैं मानता हूं, पवन आचार्य की बात पूरे देश को सुननी चाहिए और पूरे देश को माननी चाहिए। देखिये, वो क्या कहना चाहते हैं, जरुर सुनिए –
च्च्मेरा नाम पवन आचार्य है और मैं अलवर, राजस्थान से बिलॉन्ग करता हूं। मेरा मेसेज प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी से यह है कि कृपया आप इस बार च्मन की बातज् में पूरे भारत देश की जनता से आह्वान करें कि दीवाली पर वो अधिक से अधिक मिट्टी के दियों का उपयोग करें। इस से पर्यावरण का तो लाभ होगा ही होगा और हजारों कुम्हार भाइयों को रोज़गार का अवसर मिलेगा। धन्यवाद।

पवन, मुझे विश्वास है कि पवन की तरह आपकी ये भावना हिंदुस्तान के हर कोने में जरुर पहुंच जाएगी, फैल जाएगी। अच्छा सुझाव दिया है और मिट्टी का तो कोई मोल ही नहीं होता है, और इसलिए मिट्टी के दिये भी अनमोल होते हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी उसकी एक अहमियत है और दिया बनता है गरीब के घर में, छोटे-छोटे लोग इस काम से अपना पेट भरते हैं और मैं देशवासियों को जरुर कहता हूं कि आने वाले त्योहारों में पवन आचार्य की बात अगर हम मानेंगे, तो इसका मतलब है, कि दिया हमारे घर में जलेगा, लेकिन रोशनी गरीब के घर में होगी।

मेरे प्यारे देशवासियो, गणेश चतुर्थी के दिन मुझे सेना के जवानों के साथ दो-तीन घंटे बिताने का अवसर मिला। जल, थल और नभ सुरक्षा करने वाली हमारी जल सेना हो, थल सेना हो या वायु सेना हो – 1965 का जो युद्ध हुआ था पाकिस्तान के साथ, उसको 50 वर्ष पूर्ण हुए, उसके निमित्त दिल्ली में इंडिया गेट के पास एक च्शौर्यांजलिज् प्रदर्शनी की रचना की है। मैं उसे चाव से देखता रहा, गया था तो आधे घंटे के लिए, लेकिन जब निकला, तब ढाई घंटे हो गए और फिर भी कुछ अधूरा रह गया। क्या कुछ वहां नही था? पूरा इतिहास जिन्दा कर के रख दिया है। युद्ध के जिन गर्व से भरे पलों के बारे में हमारे सेनानियों के अदम्य साहस और बलिदान के बारे में हम सब सुनते रहते थे, उस समय तो उतने फोटोग्राफ भी नहीं थे, इतनी वीडियोग्राफी भी नहीं होती थी। इस प्रदर्शनी के माध्यम से उसकी अनुभूति होती है।

लड़ाई हाजीपीर की हो, असल उत्तर की हो, चामिंडा की लड़ाई हो और हाजीपीर पास के जीत के दृश्यों को देखें, तो रोमांच होता है और अपने सेना के जवानों के प्रति गर्व होता है। मुझे इन वीर परिवारों से भी मिलना हुआ, उन बलिदानी परिवारों से मिलना हुआ और युद्ध में जिन लोगों ने हिस्सा लिया था, वे भी अब जीवन के उत्तर काल खंड में हैं। वे भी पहुँचे थे। और जब उन से हाथ मिला रहा था तो लग रहा था कि वाह, क्या ऊर्जा है, एक प्रेरणा देता था। अगर आप इतिहास बनाना चाहते हैं, तो इतिहास की बारीकियों को जानना-समझना ज़रूरी होता है। इतिहास हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। इतिहास से अगर नाता छूट जाता है, तो इतिहास बनाने की संभावनाओं को भी पूर्ण विराम लग जाता है। इस शौर्य प्रदर्शनी के माध्यम से इतिहास की अनुभूति होती है। इतिहास की जानकारी होती है। और नये इतिहास बनाने की प्रेरणा के बीज भी बोये जा सकते हैं। मैं आपको, आपके परिवारजनों को – अगर आप दिल्ली के आस-पास हैं – शायद प्रदर्शनी अभी कुछ दिन चलने वाली है, आप ज़रूर देखना। और जल्दबाजी मत करना मेरी तरह। मैं तो दो-ढाई घंटे में वापिस आ गया, लेकिन आप को तो तीन-चार घंटे ज़रूर लग जायेंगे। जरूर देखिये।

लोकतंत्र की ताकत देखिये, एक छोटे बालक ने प्रधानमंत्री को आदेश किया है, लेकिन वो बालक जल्दबाजी में अपना नाम बताना भूल गया है। तो मेरे पास उसका नाम तो है नहीं, लेकिन उसकी बात प्रधानमंत्री को तो गौर करने जैसी है ही है, लेकिन हम सभी देशवासियों को गौर करने जैसी है। सुनिए, ये बालक हमें क्या कह रहा है:
च्च्प्रधानमंत्री मोदी जी, मैं आपको कहना चाहता हूं कि जो आपने स्वच्छता अभियान चलाया है, उसके लिये आप हर जगह, हर गली में डस्टबिन लगवाएं।ज्ज्
इस बालक ने सही कहा है। हमें स्वच्छता एक स्वभाव भी बनाना चाहिये और स्वच्छता के लिए व्यवस्थायें भी बनानी चाहियें। मुझे इस बालक के संदेश से एक बहुत बड़ा संतोष मिला। संतोष इस बात का मिला, २ अक्टूबर को मैंने स्वच्छ भारत को लेकर के एक अभियान को चलाने की घोषणा की, और मैं कह सकता हूं, शायद आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ होगा कि संसद में भी घंटों तक स्वच्छता के विषय पर आजकल चर्चा होती है। हमारी सरकार की आलोचना भी होती है। मुझे भी बहुत-कुछ सुनना पड़ता है, कि मोदी जी बड़ी-बड़ी बातें करते थे स्वच्छता की, लेकिन क्या हुआ ? मैं इसे बुरा नहीं मानता हूं। मैं इसमें से अच्छाई यह देख रहा हूँ कि देश की संसद भी भारत की स्वच्छता के लिए चर्चा कर रही है।
और दूसरी तरफ देखिये, एक तरफ संसद और एक तरफ इस देश का शिशु – दोनों स्वच्छता के ऊपर बात करें, इससे बड़ा देश का सौभाग्य क्या हो सकता है। ये जो आन्दोलन चल रहा है विचारों का, गंदगी की तरफ नफरत का जो माहौल बन रहा है, स्वच्छता की तरफ एक जागरूकता आई है – ये सरकारों को भी काम करने के लिए मजबूर करेगी, करेगी, करेगी! स्थानीय स्वराज की संस्थाओं को भी – चाहे पंचायत हो, नगर पंचायत हो, नगर पालिका हो, महानगरपालिका हो या राज्य हो या केंद्र हो – हर किसी को इस पर काम करना ही पड़ेगा। इस आन्दोलन को हमें आगे बढ़ाना है, कमियों के रहते हुए भी आगे बढ़ाना है और इस भारत को, २०१९ में जब महात्मा गांधी की 150वीं जयंती हम मनाएंगे, महात्मा गांधी के सपनों को पूरा करने की दिशा में हम काम करें।
और आपको मालूम है, महात्मा गांधी क्या कहते थे? एक बार उन्होंने कहा है कि आज़ादी और स्वच्छता दोनों में से मुझे एक पसंद करना है, तो मैं पहले स्वच्छता पसंद करूंगा, आजादी बाद में। गांधी के लिए आजादी से भी ज्यादा स्वच्छता का महत्त्व था। आइये, हम सब महात्मा गांधी की बात को मानें और उनकी इच्छा को पूरी करने के लिए कुछ कदम हम भी चलें। दिल्ली से गुलशन अरोड़ा जी ने MyGov पर एक मेसेज छोड़ा है।
उन्होंने लिखा है कि दीनदयाल जी की जन्म शताब्दी के बारे में वो जानना चाहते हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों, महापुरुषों का जीवन सदा-सर्वदा हमारे लिए प्रेरणा का कारण रहता है। और हम लोगों का काम, महापुरुष किस विचारधारा के थे, उसका मूल्यांकन करना हमारा काम नहीं है। देश के लिये जीने-मरने वाले हर कोई हमारे लिये प्रेरक होते हैं। और इन दिनों में तो इतने सारे महापुरुषों को याद करने का अवसर आ रहा है, 25 सितम्बर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय, 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, 11 अक्टूबर को जयप्रकाश नारायण जी, 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल – कितने अनगिनत नाम हैं, मैं तो बहुत कुछ ही बोल रहा हूँ, क्योंकि ये देश तो बहुरत्ना वसुंधरा है।

आप कोई भी डेट निकाल दीजिये, इतिहास के झरोखे से कोई-न-कोई महापुरुष का नाम मिल ही जाएगा। आने वाले दिनों में इन सभी महापुरुषों को हम याद करें, उनके जीवन का सन्देश हम घर-घर तक पहुंचायें और हम भी उनसे कुछ-न-कुछ सीखने का प्रयास करें।

मैं विशेष करके 2 अक्टूबर के लिए फिर से एक बार आग्रह करना चाहता हूं। 2 अक्टूबर पूज्य बापू महात्मा गांधी की जन्म-जयंती है। मैंने गत वर्ष भी कहा था कि आपके पास हर प्रकार के फैशन के कपड़े होंगे, हर प्रकार का फैब्रिक होगा, बहुत सी चीजें होंगी, लेकिन उसमें एक खादी का भी स्थान होना चाहिए। मैं एक बार फिर कहता हूं कि 2 अक्टूबर से लेकर के एक महीने भर खादी में रियायत होती है, उसका फायदा उठाया जाए। और खादी के साथ-साथ हैंडलूम को भी उतना ही महत्व दिया जाये। हमारे बुनकर भाई इतनी मेह्नत करते हैं, हम सवा सौ करोड़ देशवासी 5 रूपया, 10 रुपया, 50 रुपया की भी कोई हैंडलूम की चीज़, कोई खादी की चीज़ ख़रीद लें, वो पैसा, वो गरीब बुनकर के घर में जाएगा। खादी बनाने वाली ग़रीब विधवा के घर में जाएगा। और इसलिए इस दीवाली में हम खादी को ज़रुर अपने घर में जगह दें, अपने शरीर पर जगह दें। मैं कभी ये आग्रह नहीं करता हूं कि आप पूर्ण रूप से खादीधारी बनें! कुछ – बस, इतना ही आग्रह है मेरा। और देखिये, पिछली बार क़रीब-क़रीब बिक्री को डबल कर दिया। कितने ग़रीबों का फ़ायदा हुआ है। जो काम सरकार अरबों-खरबों रूपये के ऐड से नहीं कर सकती है, वो आप लोगों ने छोटे से मदद से कर दी। यही तो जनशक्ति है। और इसलिए मैं फिर से एक बार उस काम के लिए आपको आग्रह करता हूँ।

प्यारे देशवासियों, मेरा मन एक बात से बहुत आनंद से भर गया है। मन करता है, इस आनंद का आपको भी थोड़ा स्वाद मिलना चाहिये। मैं मई महीने में कोलकाता गया था और सुभाष बोस के परिवारजन मिलने आये थे। उनके भतीजे चंद्रा बोस ने सब आयोजन किया था। काफी देर तक सुभाष बाबू के परिवारजनों के साथ हंसी-खुशी की शाम बिताने का मुझे अवसर मिला था। और उस दिन ये तय किया था कि सुभाष बाबू का वृहत परिवार प्रधानमंत्री निवास-स्थान पर आये। चंद्रा बोस और उनके परिवारजन इस काम में लगे रहे थे और पिछले हफ्ते मुझे कनर्फमेशन मिला कि ५० से अधिक सुभाष बाबू के परिवारजन प्रधानमंत्री निवास-स्थान पर आने वाले हैं। आप कल्पना कर सकते हैं, मेरे लिए कितनी बड़ी खुशी का पल होगा! नेताजी के परिवारजन, शायद उनके जीवन में पहली बार सबको मिलकर के एक साथ प्रधानमंत्री निवास जाने का अवसर आया होगा। लेकिन उससे ज्यादा मेरे लिए खुशी की बात है कि प्रधानमंत्री निवास-स्थान में ऐसी मेहमाननवाज़ी का सौभाग्य कभी भी नहीं आया होगा, जो मुझे अक्टूबर में मिलने वाला है। सुभाष बाबू के ५० से अधिक – और सारे परिवार के लोग अलग-अलग देशों में रहते हैं – सब लोग खास आ रहे हैं। कितना बड़ा आनंद का पल होगा मेरे लिए। मैं उनके स्वागत के लिए बहुत खुश हूं, बहुत ही आनंद की अनुभूति कर रहा हूं।

एक संदेश मुझे भार्गवी कानड़े की तरफ से मिला और उसका बोलने का ढंग, उसकी आवाज, ये सब सुन करके मुझे ये लगा, वो ख़ुद भी लीडर लगती है और शायद लीडर बनने वाली होगी, ऐसा लगता है।
च्च्मेरा नाम भार्गवी कानड़े है। मैं प्रधानमंत्री जी से ये निवेदन करना चाहती हूं कि आप युवा पीढ़ी को वोटर रजिस्ट्रेशन के बारे में जागृत करें, जिससे आने वाले समय में युवा पीढ़ी का सहभाग बढ़े और भविष्य में युवा पीढ़ी का महत्वपूर्ण सहयोग सरकार चुनने में हो और चलाने में भी हो सके। धन्यवाद।

भार्गवी ने कहा है कि मतदाता सूची में नाम रजिस्टर करवाने की बात और मतदान करने की बात। आपकी बात सही है। लोकतंत्र में हर मतदाता देश का भाग्यविधाता होता है और ये जागरूकता धीरे-धीरे बढ़ रही है। मतदान का परसेंटेज भी बढ़ रहा है। और मैं इसके लिए भारत के चुनाव आयोग को विशेष रूप से बधाई देना चाहता हूं। कुछ वर्ष पहले हम देखते थे कि हमारा चुनाव आयोग एक सिर्फ़ रेगुलेटर के रूप में काम कर रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उसमें बहुत बड़ा बदलाव आया है। आज हमारा चुनाव आयोग सिर्फ़ रेगुलेटर नहीं रहा है, एक प्रकार से फैशिलेटर बन गया है, वोटर फ्रैंडली बन गया है और उनकी सारी सोच, सारी योजनाओं में मतदाता उनके केंद्र में रहता है। ये बहुत अच्छा बदलाव आया है। लेकिन सिर्फ़ चुनाव आयोग काम करता रहे, इससे चलने वाला नहीं है। हमें भी स्कूल में, कॉलेज में, मोहल्ले में, ये जागृति का माहौल बनाए रखना चाहिये – सिर्फ़ चुनाव आये, तब जागृति हो, ऐसा नहीं। मतदाता सूची अपग्रेड होती रहनी चाहिए, हमें भी देखते रहना चाहिए। मुझे अमूल्य जो अधिकार मिला है, वो मेरा अधिकार सुरक्षित है कि नहीं, मैं अधिकार का उपयोग कर रहा हूं कि नहीं कर रहा हूं, ये आदत हम सबको बनानी चाहिए। मैं आशा करता हूं, देश के नौजवान अगर मतदाता सूची में रजिस्टर नहीं हुए हैं, तो उन्हें होना चाहिए और मतदान भी अवश्य करना चाहिए। और मैं तो चुनावों के दिनों में पब्लिकली कहा करता हूं कि पहले मतदान, फिर जलपान। इतना पवित्र काम है, हर किसी ने करना चाहिये।
परसों मैं काशी का भ्रमण करके आया। बहुत लोगों से मिला, बहुत सारे कार्यक्रम हुए। इतने लोगों से मिला, लेकिन दो बालक, जिनकी बात मैं आपसे करना चाहता हूँ। एक मुझे क्षितिज पाण्डेय करके 7वीं कक्षा का छात्र मिला। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में केंद्रीय विद्यालय में वो 7वीं कक्षा में पढ़ता है। वैसे है बड़ा तेजतर्रार। उसका आत्मविश्वास भी बड़ा गज़ब है7 लेकिन इतनी छोटी आयु में फिजिक्श के अनुसंधान में उसकी रूचि मैंने देखी। मुझे लगा कि बहुत-कुछ वो पढ़ता होगा, इंटरनेट सर्फिंग करता होगा, नए-नए प्रयोग देखता होगा, रेल एक्सिडेंट कैसे रोके जाएं, कौन सी टेकनालॉजी हो, एनर्जी में खर्चा कैसे कम हो, रोबोट में फीलिंग कैसे आये, न-जाने क्या-क्या बातें बता रहा था। बड़ा गज़ब का था, भाई! खैर, मैं बारीकी से उसका ये तो नहीं देख पाया कि वो जो कह रहा है, उसमें कितनी बारीकी है, क्या है, लेकिन उसका आत्मविश्वास, उसकी रुचि, और मैं चाहता हूं कि हमारे देश के बालकों की विज्ञान के प्रति रुचि बढ़नी चाहिए। बालक के मन में लगातार सवाल उठने चाहिये – क्यों? कैसे? कब? ये बालक मन से पूछना चाहिये।

वैसे ही मुझे सोनम पटेल, एक बहुत ही छोटी बालिका से मिलना हुआ। 9 साल की उम्र है। वाराणसी के सुन्दरपुर निवासी सदावृत पटेल की वो एक बेटी, बहुत ही गरीब परिवार की बेटी है। और मैं हैरान था कि बच्ची, पूरी गीता उसको कंठस्थ है। लेकिन सबसे बड़ी बात मुझे ये लगी कि जब मैंने उसको पूछा, तो वो श्लोक भी बताती थी, अंग्रेजी में विवेचना करती थी, उसकी परिभाषा करती थी, हिन्दी में परिभाषा करती थी। मैंने उनके पिताजी को पूछा, तो बोले, वो पांच साल की उम्र से बोल रही है। मैंने कहा, कहां सीखा? बोले, हमें भी मालूम नहीं है। तो मैंने कहा, और पढ़ाई में क्या हाल है, सिर्फ़ गीता ही पढ़ती रहती है और भी कुछ करती है? तो उन्होंने कहा, नहीं जी, वो मैथमैटिक्स एक बार हाथ में ले ले, तो शाम को उसको सब मुखपाठ होता है। हिस्ट्री ले लें, शाम को सब याद होता है। बोले, हम लोगों के लिए भी आश्चर्य है, पूरे परिवार में कि कैसे उसके अंदर है। मैं सचमुच में बड़ा प्रभावित था। कभी कुछ बच्चों को सिलेब्रिटी का शौक हो जाता है, ऐसा ही सोनम में कुछ नहीं था। अपने आप में ईश्वर ने कोई शक्ति ज़रूर दी है, ऐसा लग रहा था मुझे।

खैर इन दोनों बच्चे, मेरी काशी यात्रा में एक विशेष मेरी मुलाक़ात थी। तो मुझे लगा, आपसे भी बता दूं। TV पर जो आप देखते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं, उसके सिवाय भी बहुत सारे काम हम करते हैं। और कभी-कभी ऐसे कामों का कुछ आनंद भी आता है। वैसा ही, इन दो बालकों के साथ, मेरी बातचीत मेरे लिए यादगार थी।

मैंने देखा है कि च्मन की बातज् में कुछ लोग मेरे लिए काफी कुछ काम लेकर के आते हैं। देखिये, हरियाणा के संदीप क्या कह रहे हैं – च्च्संदीप, हरियाणा। सर, मैं चाहता हूँ कि आप जो च्मन की बातज् ये महीने में एक बार करते हैं, आपको वीकली करनी चाहिए, क्योंकि आपकी बात से बहुत प्रेरणा मिलती है।
संदीप जी, आप क्या-क्या करवाओगे मेरे पास? महीने में एक बार करने के लिए भी मुझे इतनी मशक्कत करनी पड़ती है, समय का इतना एडजस्ट करना पड़ता है। कभी-कभी तो हमारे आकाशवाणी के सारे हमारे साथियों को आधा-आधा पौना-पौना घंटा मेरा इंतजार करके बैठे रहना पड़ता है। लेकिन मैं आपकी भावना का आदर करता हूँ। आपके सुझाव के लिए मैं आपका आभारी हूं। अभी तो एक महीने वाला ही ठीक है।

च्मन की बातज् का एक प्रकार से एक साल पूरा हुआ है। आप जानते हैं, सुभाष बाबू रेडियो का कितना उपयोग करते थे? जर्मनी से उन्होंने अपना रेडियो शुरू किया था। और हिन्दुस्तान के नागरिकों को आज़ादी के आन्दोलन के संबंध में वो लगातार रेडियो के माध्यम से बताते रहते थे। आज़ाद हिन्द रेडियो की शुरुआत एक वीकली न्यूड बुलेटिन से उन्होंने की थी। अंग्रेजी, हिन्दी, बंगाली, मराठी, पंजाबी, पश्तो, उर्दू – सभी भाषाओं में ये रेडियो वो चलाते थे।

मुझे भी अब आकाशवाणी पर च्मन की बातज् करते-करते अब एक साल हो गया है। मेरे मन की बात आपके कारण सच्चे अर्थ में आपके मन की बात बन गयी है। आपकी बातें सुनता हूँ, आपके लिए सोचता हूं, आपके सुझाव देखता हूं, उसी से मेरे विचारों की एक दौड़ शुरू हो जाती है, जो आकाशवाणी के माध्यम से आपके पास पहुँचती है। बोलता मैं हूं, लेकिन बात आपकी होती है और यही तो मेरा संतोष है। अगले महीने च्मन की बातज् के लिए फिर से मिलेंगे। आपके सुझाव मिलते रहें। आपके सुझावों से सरकार को भी लाभ होता है। सुधार की शुरुआत होती है। आपका योगदान मेरे लिए बहुमूल्य है, अनमोल है।