मूवी रिव्यू: रोमांटिक, कॉमेडी ‘कट्टी बट्टी’

मूवी रिव्यू: रोमांटिक, कॉमेडी ‘कट्टी बट्टी’

आजकल फिल्मों को बेहतर या और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए कहानी-पटकथा की गुणवत्ता पर द्यान कम, बल्कि कुछ अन्य चीजों का तवज्जो ज्यादा दी जाने लगी है। इनमें से एक चीज है फ्लैशबैक। अगर कुशलता से और जरूरत के हिसाब से रचनात्मक ढंग से इसका इस्मेमाल किया जाए तो फिल्म में मजा आता है, उत्सुकता बनी रहती है। लेकिन अगर कहीं निर्देशक इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं या फिर सही ढंग से फिल्म में प्रयोग करने से चूक जाते हैं तो ‘कट्टी बट्टी’ जैसी फिल्म बनती है। वो कैसे, ये जानने से पहले जरा एक नजर फिल्म की कहानी पर।

ये कहानी है माधव काबरा (इमरान खान) उर्फ मैडी और पायल (कंगना रनौत) की। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं। मैडी को पायल से पहली ही नजर में प्यार हो जाता है। पहली ही मुलाकात में वो पायल को आई लव यू बोल देता है और लगे हाथ शादी का प्रस्ताव भी दे डालता है। नखरेबाज पायल के आगे-पीछे दो-तीन दर्जन चक्कर लगाने के बाद आखिरकार बात बन जाती है और दोनों मुंबई आकर लिव-इन में रहने लगते हैं। एक दिन पायल अचानक घर छोड़ कर चली जाती है। बहुतेरा ढूंढने के बाद भी जब मैडी को पायल नहीं मिलती तो वह एक दिन तनाव में फिनायल पी लेता है। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाया जाता है, जहां से डिस्चार्ज होने के बाद उसकी बहन कोयल उसे अपने साथ ले जाती है।

पायल को गए छह हफ्ते हो चुके हैं और मैडी की इस हालत से उसके सारे यार-दोस्त परेशान हैं। एक दिन मैडी को पता चलता है कि पायल दिल्ली में है और उसकी शादी रिक्की से होने वाली है। रिक्की इन दोनों का एक कॉलेज फ्रेंड है, जिसकी कभी मैडी ने खूब पिटाई की थी। बिना किसी नाम पते के मैडी पायल को ढूंढता दिल्ली आ जाता है। काफी जद्दोजेहद के बाद वह किसी तरह वह विवाह स्थल पर भी पहुंच जाता है और शादी को रोकने की कोशिश भी करता है, लेकिन ऐन मौके पर पहुंच कर पायल उसे अपना जबाव एक तमाचे से देती है।

हक्का-बक्का निखिल वहां से वापस चला जाता है, लेकिन उसे अब भी विश्वास है कि पायल उससे अब भी प्यार करती है। कोयल मैडी को फिर समझाती है कि उसे पायल को भूल जाना चाहिए। तभी मैडी को कोयल के बैग से एक कंगन मिलता है, जो कभी मैडी की मां ने पायल को दिया था। मैडी को समझते देर नहीं लगती कि पायल, कोयल और उसके सारे दोस्स उससे कुछ छिपा रहे हैं। आखिर वो कौन सी बात या वजह है, जिससे पायल उससे दूर जाना चाहती है। कोयल जब मैडी को असलियत बताती है तो वह पूरी तरह से टूट जाता है। अब आप कहीं ये तो नहीं समझ रहे कि ये कोई सस्पेंस फिल्म है, जिसमें नायक से नायिका के बारे में कुछ छिपाया जा रहा है।

बेशक, ये एक रोम-कॉम यानी रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म ही, लेकिन इस कहानी को जिस ढंग से बयां किया गया है, वो किसी जलेबी से भी ज्यादा टेड़ा-मेढ़ा है। कॉलेज में एक लड़का-लड़की के मिलने का सीन और उनके बीच नया-नया पनपा प्यार देख कर लगता है कि निर्देशक ने लेखन को तवज्जो दी ही नहीं है। अब नायिका, नायक को छोड़ कर चली गयी है और वो देवदास बन गया है। किसी को नहीं पता कि नायिका क्यों और कहां गयी है। ये तमाम बातें बेहद घिसी-पिटी और पुराने ढर्रे के फॉर्मूले से प्रेरित हैं।

न जाने आज की यंग जेनरेशन इसे एक मिनट भी बर्दाश्त कैसे कर पाएगी। मैडी, पायल के जाने से लगभग पागल सा हो गया है, लेकिन पागल लगता नहीं है। वो काम पर जाता है और सिर्फ अपने दोस्त से लड़ता रहता है। एक बच्चे की तरह उसने सबकी जिंदगी हिलाकर रख दी है। मजे की बात है कि इस पूरे झगड़े से पायल का कुछ लेना-देना है ही नहीं, क्योंकि वो सो किसी सीन में है ही नहीं। अगर है तो सिर्फ फ्लैशबैक्स में। केवल यादों में। ये फ्लैशबैक इतनी तेजी से आते-जाते हैं कि अच्छे और प्रभावी कर, बल्कि झुंझलाहट ज्यादा पैदा करते हैं।

उसके ऊपर इमरान का बासी अभिनय। ऐसा लगता ही नहीं कि इस कलाकार की आप कोई नई फिल्म देख रहे हों। कंगना का किरदार उनकी पिछली फिल्म च्तुन वेड्स मनु र्टिन्सज् का शहरी वर्जन है। यानी तनूजा त्रिवेदी कानपुर से निकल मुंबई जाकर कैसी लगेगी, ये दखना है कि आप च्कट्टी बट्टीज् की पायल को देख लीजिए। ये फिल्म अपनी थोड़ी बहुत लाज केवल अंत के 15-20 मिनट में ही बचा पाती है, जब पायल के दूर जाने की असली वजह सामने आती है। उसे भी ज्यादातर दर्शक पहले ही समझ लेंगें, क्योंकि दर्द का ये फॉर्मूला बरसों पुराना है। खुद निखिल आडवाणी इसी फॉर्मूले से कभी रातों रात चमके थे।

फिल्म का गीत-संगीत भी बस औसत दर्जे का ही है। याद नहीं पड़ता कि कोई गीत गुनगुनाने लायक भी हो। फिर भी गीत च्लि टू लिप..ज् का फिल्मांकन आकर्षित करता है। ये एक नए कॉन्सेप्ट का गीत है, जिसे फिल्म च्फुकरेज् के एक गीत लग गयी लौटरी…और फिल्म च्उंगलीज् के एक गीत उंगली पे नचाले…में भी दर्शाया गया है। इस नए कॉन्सेप्ट में जमीन या दिवार पर हल्का-फुल्का सेट डिजाइन, रंगों का इस्तेमाल और ग्राफिक एवं एनिमेशन की मदद से एक स्टोरीबोर्ड तैयार किया जाता है, जिसे संगीत के साथ मैच किया जाता है।

कुल मिलाकर ‘कट्टी बट्टी’ एक बेहद निराश करने वाली फिल्म है, जो पुरानी और बेजान कहानी के अलावा अपने ट्रीटमेंट और बोरिंग अभिनय से केवल सिरदर्द देती है और कुछ नहीं।

रेटिंग : 1.5 स्टार
कलाकार : कंगना रनौत, इमरान खान
निर्देशक : निखिल आडवाणी
निर्माता : सिद्धार्थ राय कपूर
गीत : कुमार
संगीत : शंकर-अहसान-लॉय
कहानी : अंशुल सिंघल, निखिल आडवाणी