कॉमेडी का ओवरडोज है “वेलकम बैक”

कॉमेडी का ओवरडोज है “वेलकम बैक”

कहते हैं कि ठोकर लगने के बाद इंसान की अक्ल ठिकाने आ जाती है। अनीज बज्मी के साथ भी यही हुआ लगता है। वर्ना कॉमेडी फिल्मों के नाम पर च्नो प्रॉब्लमज् (2010) और च्थैंक्यूज् (2011) जैसा सिरदर्द परोसने वाले अनीस को तो लोग कब का भूल गये थे। अब लगभग चार साल के बाद वह च्वैलकम बैकज् के साथ लौटे हैं, जो 2007 में आयी उन्हीं की फिल्म च्वैलकमज् का सीक्वल है।

इस साल आयी फिल्म च्तनु वेड्स मनु रिटर्न्सज् के बाद ये दूसरी ऐसी फिल्म कही जा सकती है, जिसका अपने पहले भाग से सीधा संबंध है। न केवल किरदारों के मामले में, बल्कि कहानी के स्तर पर भी यह सही मायने में एक सीक्वल लगता है।

इस दूसरे भाग में मजनूं भाई (अनिल कपूर) भी है और उदय शेट्टी (नाना पाटेकर) भी। फर्क है तो बस इतना कि अब ये दोनों भाई लोग, भाईगिरी छोड़ कर गांधीगिरी करने लगे हैं। सात साल पहले अपनी बहन की शादी के बाद इन्होंने सारे बुरे काम छोड़ दिये हैं। हालत ये हो चली है कि छोटे-मोटे गुंडे भी अब इनसे हफ्ता वसूलने लगे हैं। ये सब देख मजनूं से तो रहा नहीं जाता है और अपने पुराने दिन याद कर करके दिन में बीस बार उसकी रगों में उबाल आता रहता है। हालांकि ऐसा ही उबाल कभी-कभी उदय की रगों में भी आता है, लेकिन उसका चेला बल्लू (मुश्ताक खान) भाई कंट्रोल, भाई कंट्रोल कहकर उसे शांत करा देता है।

एक दिन उदय-मजनूं को ये अहसास होता है कि अब उन्हें भी शादी कर लेनी चाहिए। और इस अहसास की वजह है राजकुमारी ऑफ नजफगढ़ (अंकिता श्रीवास्तव), जिसे देखते ही दोनों को उससे प्यार हो गया है। लेकिन इस राजकुमारी की असलियत वे दोनों नहीं जानते। ये राजकुमारी, बेटी है महारानी ऑफ नजफगढ़ (डिंपल कपाड़िया) की, जिनके दिन आजकल मुफलिसी में कट रहे हैं।

अब कहानी में ट्विस्ट ये है कि मजनू-उदय अपनी शादी के बारे में सोच ही रहे हैं कि अचानक से उदय का पिता आ जाता है। साथ में ले आता है इन दोनों की एक बहन, जिसका नाम है रंजना (श्रुति हसन)। अब उन्हें इसकी शादी करानी है। हैरान-परेशान उदय-मजनूं पहुंच जाते हैं डॉ. घुंघरू (परेश रावल) के यहां। उन्हें लगता है कि शरीफ लड़का तो उनके घर ही मिलेगा। इधर, डॉ. घुंघरू के घर भी एक रेडीमेड बेटा तैयार बैठा है। नाम है अज्जू भाई (जॉन अब्राहम), जो छटा हुआ गुंडा है। अज्जू, मिसेज घुंघरू (सुप्रिया कार्निक) के गुजरे जमाने की एक च्भूलज् की देन है, जिसकी झल्लाहट डॉ. घुंघरू अभी ठीक से निकाल भी नहीं पाता कि धड़ाधड़ा नई-नई मुसीबतें आने लगती हैं।

उदय-मजूनं, अज्जू की असलियत से अनजान हैं। लेकिन ये राज अज्जू-रंजना की सगाई वाले दिन खुल जाता है। सगाई टूट जाती है। कहानी आगे बढ़ती वॉन्टेड (नसीरूद्दीन शाह) की धमाकेदार एंट्री के साथ, जिसके इकलौते गंजेड़ी बेटे सनी (शाईनी आहूजा) का दिल रंजना पर आ गया है। उदय-मजनूं के लिए डबल मुसीबत हो जाती है। वो तो अज्जू जैसे गुंडे से पीछा छुड़ा कर आये थे, यहां तो डॉन का बेटा पीछे पड़ गया है। अब बेचारे दोनों करें तो क्या करें..

करीब आधा दर्जन लोगों की टीम के साथ निर्देशक ने कहानी तो लगभग ठीक-ठीक ही गढ़ ली है। ढेर सारे कलाकारों को संभाल लेना अनीस की खासियत रही है। उन्हें लगता है कि इससे दर्शकों को मनोरंजन का डोज बराबर मिलता रहता है, इसलिए परिचय और किरदारों को पुख्ता करने के चक्कर में उन्होंने समय नहीं गंवाया है और पहले ही सीन से कॉमेडी का भरपूर अटैक किया है। इस हमले में ग्लैमर पक्ष हावी रहा है, जिसकी बौछार की जिम्मेदारी अंकिता और श्रुति पर डाली गयी है। वैसे भी इन दोनों का ही अभिनय सबसे ज्यादा निराश करने वाला है।

च्वैलकम बैकज् की खासियत है, जिसके चुटीले जोक्स। नाना का ये कहना- च्बेटा गन और गुण की स्पैलिंग एक ही होती है, ध्यान रखिये…ज् नसीर साहब का एक संवाद- च्अरे हम तो शिकार पर कई दिनों से गए ही नहीं, फिर से गोली किसने चला दी…ज् या फिर परेश रावल का ये कहना- च्अरे जब मैंने वोट दिया ही नहीं तो मेरा मुख्यमंत्री कहां से आया…ज् ऐसे और भी ढेर जोक्स है, जो पल पल में हंसाते-गुगुदाते हैं।

इसके अलावा फिल्म में नाना-अनिल की कैमिस्ट्री भी जबरदस्त दिखती है। जैसे कब्रिस्तान का एक सीन। ज्योतिषी वाला सीन, जिसमें ये दोनों अपने-अपने ढंग से कुंडलियां सेट करवाने पर जोर डालते हैं। इसके अलावा एक अंधे डॉन के रूप में नसीरूद्दीन शाह ने भी बांधे रखा है। इंटरवल के बाद कॉमेडी का तंबू उन्होंने ही थामे रखा है। दुबई के आलीशान होटलों और निजी आईलैंड्स पर शूट किये गे सीन्स अच्छे लगते हैं। बड़े परदे पर मुफ्त का ये पर्यटन बुरा नहीं है।

हां, कमी खलती है तो फिल्म की लंबाई की, जिस पर कई जगह बड़े प्यार से कैंची चलाई जा सकती थी। खासतौर से क्लाईमैक्स में। यहां लंबे सीन्स है। ढाई घंटे से ऊपर की यह फिल्म अपने गीत-संगीत से बांध नहीं पाती। गीत केवल देखने में आकर्षित करते हैं। एक-दो गीत कम भी किये जा सकते थे, जिनके बोल, चालू और कहीं-कहीं भद्दे किस्म के हैं।

बहुत ज्यादा लॉजिक वगैराह के चक्कर में न पड़ें तो आजकल ऐसी ही कॉमेडी फिल्में आ रही है, जिनकी कहानी में च्तुकज् की गुंजाइश न के बराबर रहती है। वैसे भी हमारी हिन्दी फिल्मों में सिर पर चोट लगने से याद्दाश्त आती-जाती रहती है, आंखें भी खोई-पायी गयी है और मेले में बिछुड़ कर सालों बाद फिर से मिलने की कहानियां तो सुल्वर जुबली हुई हैं। ये फिल्म भी कुछ ऐसे ही अनपचेबल रास्तों से होकर गुजरती है, इसलिए इसे च्वैलकम बैकज् कहने में कोई बुराई तो नहीं दिखती।

रेटिंग : 3 स्टार
कलाकार : अनिल कपूर, नाना पाटेकर, जॉन अब्राहम, श्रुति हसन, परेश रावल, डिंपल कपाडिम्या, नसीरूद्दीन शाह, शाईनी आहूजा, अंकिता श्रीवास्तव, सुप्रिया कार्निक, आदि ईरानी, मुश्ताक खान
निर्देशन : अनीस बज्मी
निर्माता : सुनील ए. लुल्ला, फिरोज नाडियाडवाला
कहानी : अनीस बज्मी, राजीव कौल
संवाद : राज शांडिल्य
पटकथा : राजीव कौल, प्रफुल्ल पारिख, राजन अग्रवाल, अनीज बज्मी