आठ हजार के मकान पर बारह लाख का ब्याज

आठ हजार के मकान पर बारह लाख का ब्याज

लखनऊ। अपनी कार्यप्रणाली से चर्चा में रहने वाले वाला एलडीए एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बार एलडीए के बाबुओं ने आठ हजार के मकान पर बारह लाख रुपये का ब्याज लगा दिया है। अब आवंटी एलडीए के चक्कर लगा रहा है। जी हां एलडीए में कोई काम इतनी आसानी से नहीं होता, यहां पिता द्वारा खरीदे गए मकान का फ्री होल्ड या तो बेटा करा पाता है या फिर पोता। हां अगर बाबू चाह जाए तो यह काम मिनटों में हो जाता है। ऐसी बानगी यहां आए दिन देखी जा सकती हैं।

केस एक : वर्ष 1982 में आठ हजार में खरीदे गए मकान की कीमत 34 साल बाद 12 लाख रुपये हो गई। यह हाल तब है जब आवंटी ने छह हजार रुपये दो दशक पहले ही जमा कर दिए थे। अब आवंटी गुरविंदर कौर अपने बेटे के साथ एलडीए के चक्कर लगाने को विवश हैं। हालांकि वर्तमान में आवंटी अपने मकान में रह रहा है। गुरुविंदर कौर कहती हैं कि वर्ष 1982 में मोतीझील में एक कमरे का मकान आवंटित कराया था। उस दौरान एलडीए की किस्त 64 रुपये हुआ करती थी। करीब छह हजार रुपये जमा कर दिए थे। दो हजार जब बाकी रह गए तो संबंधित बाबू से रजिस्ट्री के लिए कहा, लेकिन बाबू ने फाइल खो जानी की बात कह दी थी। आवंटी को उम्मीद है कि कुछ अफसरों की मदद से उनका काम हो जाएगा।

केस दो : अरविंद कुमार दुबे ने एलडीए योजना के अंतर्गत कानपुर रोड पर 1997 में 2152 स्क्वायर फीट का प्लाट बुक कराया था। वर्ष 2002 तक किस्त देने के बाद जब एलडीए से रजिस्ट्री की बात कही तो बताया गया कि आप का प्लॉट ही नक्शे में नहीं है यानी मिस हो गया है। दुबे ने कई अफसरों से गुहार लगाई, लेकिन अपनी आदतों से मजबूर बाबू व अधिकारी कुछ न कर सके। दुबे ने लोकायुक्त का जब दरवाजा खटखटाया तो लोकायुक्त ने उपाध्यक्ष को तलब कर लिया। तत्कालीन एलडीए उपाध्यक्ष ने लोकायुक्त की फटकार से बचने के लिए तालाब पर ही प्लाट कटवाकर रजिस्ट्री करवा दी और प्लाट नंबर ए 1 223 बता दिया लेकिन कब्जा आज तक नहीं मिला।

यह दो मामले सिर्फ बानगी हैं। ऐसे कई मामले एलडीए में आए दिन देखे जा सकते हैं। योजना देख रहे बाबुओं की मर्जी के बिना लखनऊ विकास प्राधिकरण में पत्ता तक नहीं हिलता। एलडीए के वरिष्ठ अधिकारी भी इसके आगे बेबस हैं।